एक मुद्दत से अधूरी दास्ताँ है क्या करूँ

मैं सफ़र में हूँ मगर सब राएगाँ है क्या करूँ

मेरा दिल उजड़ा हुआ इक बोस्ताँ है क्या करूँ
और माली मेरा बे-नाम-ओ-निशाँ है क्या करूँ

कब से वस्ल-ए-यार की है आरज़ू नादाँ मगर
हिज्र उस के और मेरे दरमियाँ है क्या करूँ

आलम-ए-तन्हाई में ये दर्द-ए-दिल बढ़ता गया
मैं ज़मीं हूँ मेरा दिलबर आसमाँ है क्या करूँ

साथ जिस के कहकशाँ के पार जाना था मुझे
वो मेरे दर-पेश बैठा जाँ-सिताँ है क्या करूँ

मर्द भी हूँ हौसला भी है हुनर भी है मगर
लड़कियों के दस्तरस में ये जहाँ है क्या करूँ

क़द्र क्या होगी हुनरमंदों की ऐ अहल-ए-हुनर
हर तरफ़ झूठी चमक का कारवाँ है क्या करूँ

मय-कशी और शाइरी से दिल बहलता है मगर
मुब्तला-ए-इश्क़ में दिल ग़म-कशाँ है क्या करूँ

— ABhishek Parashar

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