Afzal Gauhar Rao

Top 10 of Afzal Gauhar Rao

    मिसाल-ए-बर्ग किसी शाख़ से झड़े हुए हैं
    इसी लिए तो तिरे पाँव में पड़े हुए हैं

    ज़मीं ने ऊँचा उठाया हुआ है वर्ना दोस्त
    हवा में घास के तिनके कहाँ पड़े हुए हैं

    किसी ने मेरी ज़मीं छान कर नहीं देखी
    वगर्ना कितने सितारे यहाँ पड़े हुए हैं

    यहाँ सरों पे यूँही बर्फ़ आ पड़ी वर्ना
    बड़े भी उम्र से अपनी कहाँ बड़े हुए हैं

    किसी के हुक्म से ऐसा जुमूद तारी है
    ज़मीं रवाना हुई और हम खड़े हुए हैं
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    10
    0 Likes
    चुप-चाप निकल आए थे सहरा की तरफ़ हम
    चलते हुए क्या देखते दुनिया की तरफ़ हम

    पामाल किए जाती है इस वास्ते दुनिया
    बैठे हैं तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा की तरफ़ हम

    किस प्यास से ख़ाली हुआ मश्कीज़ा हमारा
    दरिया से जो उठ आए हैं सहरा की तरफ़ हम

    क्या चाहती है निय्यत-ए-बाज़ार-ए-ज़माना
    खिंचते चले जाते हैं जो अशिया की तरफ़ हम

    ये अजनबी लोगों की ज़रा भीड़ छटे तो
    जाएँगे किसी अपने शनासा की तरफ़ हम

    'गौहर' ये ज़मीं हम को बहुत याद करेगी
    उठ जाएँगे जब आलम-ए-बाला की तरफ़ हम
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    9
    0 Likes
    आई थी उस तरफ़ जो हवा कौन ले गया
    ख़ाली पड़ा है ताक़ दिया कौन ले गया

    इस शहर में तो कोई सुलैमान भी नहीं
    मैं क्या बताऊँ तख़्त-ए-सबा कौन ले गया

    दुश्मन अक़ब में आ भी गया और अभी तलक
    तुम को ख़बर नहीं है असा कौन ले गया

    अपने बदन से लिपटा हुआ आदमी था मैं
    मुझ से छुड़ा के मुझ को बता कौन ले गया

    'गौहर' ये माजरा तो परिंदों से पूछना
    पेड़ों को क्या पता है हवा कौन ले गया
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    8
    0 Likes
    शिकस्त खा के भी कब हौसले हैं कम मेरे
    मिरे कटे हुए हाथों में हैं अलम मेरे

    पनाह-गाह मुझे भी तो सौर जैसी दे
    मिरी तलाश में दुश्मन हैं ताज़ा-दम मेरे

    तुझे मैं कैसे बताऊँ कहाँ से कैसा हूँ
    उलझ रहे हैं ब-दस्तूर पेच-ओ-ख़म मेरे

    किस आसमान की वुसअत तलाश करते हुए
    ज़मीं से दूर निकल आए हैं क़दम मेरे

    तू ये सवाल भी अब दजलाफ़ुरात से पूछ
    मैं क्या बताऊँ कहाँ लुट गए हरम मेरे

    जमी रही है चटानों पे बर्फ़ सदियों तक
    तो जा के फिर कहीं पत्थर हुए हैं नम मेरे
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    7
    0 Likes
    मैं सुन रहा हूँ जो दुनिया सुना रही है मुझे
    हँसी तो अपनी ख़मोशी पे आ रही है मुझे

    मिरे वजूद की मिट्टी में ज़र नहीं कोई
    ये इक चराग़ की लौ जगमगा रही है मुझे

    ये कैसे ख़्वाब की ख़्वाहिश में घर से निकला हूँ
    कि दिन में चलते हुए नींद आ रही है मुझे

    कोई सहारा मुझे कब सँभाल सकता है
    मिरी ज़मीन अगर डगमगा रही है मुझे

    मैं इस जहान में ख़ुश हूँ मगर कोई आवाज़
    नए जहान की जानिब बुला रही है मुझे
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    6
    0 Likes
    देर तक कोई किसी से बद-गुमाँ रहता नहीं
    वो वहाँ आता तो होगा मैं जहाँ रहता नहीं

    एक मैं हूँ धूप में कितना सफ़र तय कर लिया
    एक तू है जो कभी बे-साएबाँ रहता नहीं

    तुम को क्यूँ पेड़ों पे लिक्खे नाम मिटने का है दुख
    इस बदलती रुत में पत्थर पर निशाँ रहता नहीं

    वो बना लेता है अपना घोंसला दीवार में
    जिस परिंदे का शजर में आशियाँ रहता नहीं

    तू परिंदों की तरह उड़ने की ख़्वाहिश छोड़ दे
    बे-ज़मीं लोगों के सर पर आसमाँ रहता नहीं
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    5
    0 Likes
    सब को बता रहा हूँ यही साफ़ साफ़ मैं
    जलते दिए से कैसे करूँ इंहिराफ़ में

    मैं ने तो आसमान के रंगों की बात की
    कहने लगी ज़मीन बदल दूँ ग़िलाफ़ में

    गुमराह कब किया है किसी राह ने मुझे
    चलने लगा हूँ आप ही अपने ख़िलाफ़ में

    मिलता नहीं है फिर भी सिरा आसमान का
    कर कर के थक चुका हूँ ज़मीं का तवाफ़ में

    अब तू भी आइने की तरह बोलने लगा
    पत्थर से भर न दूँ तिरे मुँह का शिगाफ़ में
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    4
    0 Likes
    ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले
    बर्फ़ से उठता हुआ एक धुआँ था पहले

    मुझ से आबाद हुई है तिरी दुनिया वर्ना
    इस ख़राबे में कोई और कहाँ था पहले

    एक ही दाएरे में क़ैद हैं हम लोग यहाँ
    अब जहाँ तुम हो कोई और वहाँ था पहले

    उस को हम जैसे कई मिल गए मजनूँ वर्ना इश्क़ लोगों के लिए कार-ए-ज़ियाँ था पहले

    ये जो अब रेत नज़र आता है अफ़ज़ल 'गौहर'
    इसी दरिया में कभी आब-ए-रवाँ था पहले
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    3
    0 Likes
    नींद आई न खुला रात का बिस्तर मुझ से
    गुफ़्तुगू करता रहा चाँद बराबर मुझ से

    अपना साया उसे ख़ैरात में दे आया हूँ
    धूप के डर से जो लिपटा रहा दिन भर मुझ से

    कौन सी ऐसी कमी मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में है
    आइना ख़ुश नहीं होता कभी मिल कर मुझ से

    क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़
    बाँध जाता है कोई रात का पत्थर मुझ से

    दश्त की सम्त निकल आया है मेरा दरिया
    बस इसी पर हैं ख़फ़ा सारे समुंदर मुझ से

    अपने हाथों को जो कश्कोल बनाया 'गौहर'
    गिर पड़ा जाने कहाँ मेरा मुक़द्दर मुझ से
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    2
    0 Likes
    हिज्र में इतना ख़सारा तो नहीं हो सकता
    एक ही इश्क़ दोबारा तो नहीं हो सकता

    चंद लोगों की मोहब्बत भी ग़नीमत है मियाँ
    शहर का शहर हमारा तो नहीं हो सकता

    कब तलक क़ैद रखूँ आँख में बीनाई को
    सिर्फ़ ख़्वाबों से गुज़ारा तो नहीं हो सकता

    रात को झेल के बैठा हूँ तो दिन निकला है
    अब मैं सूरज से सितारा तो नहीं हो सकता

    दिल की बीनाई को भी साथ मिला ले 'गौहर'
    आँख से सारा नज़ारा तो नहीं हो सकता
    Read Full
    Afzal Gauhar Rao
    1
    1 Like