ज़मीं ने ऊँचा उठाया हुआ है वर्ना दोस्त
हवा में घास के तिनके कहाँ पड़े हुए हैं
किसी ने मेरी ज़मीं छान कर नहीं देखी
वगर्ना कितने सितारे यहाँ पड़े हुए हैं
यहाँ सरों पे यूँही बर्फ़ आ पड़ी वर्ना
बड़े भी उम्र से अपनी कहाँ बड़े हुए हैं
किसी के हुक्म से ऐसा जुमूद तारी है
ज़मीं रवाना हुई और हम खड़े हुए हैं
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चुप-चाप निकल आए थे सहरा की तरफ़ हम
चलते हुए क्या देखते दुनिया की तरफ़ हम
चलते हुए क्या देखते दुनिया की तरफ़ हम
पामाल किए जाती है इस वास्ते दुनिया
बैठे हैं तिरे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा की तरफ़ हम
किस प्यास से ख़ाली हुआ मश्कीज़ा हमारा
दरिया से जो उठ आए हैं सहरा की तरफ़ हम
क्या चाहती है निय्यत-ए-बाज़ार-ए-ज़माना
खिंचते चले जाते हैं जो अशिया की तरफ़ हम
ये अजनबी लोगों की ज़रा भीड़ छटे तो
जाएँगे किसी अपने शनासा की तरफ़ हम
'गौहर' ये ज़मीं हम को बहुत याद करेगी
उठ जाएँगे जब आलम-ए-बाला की तरफ़ हम
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आई थी उस तरफ़ जो हवा कौन ले गया
ख़ाली पड़ा है ताक़ दिया कौन ले गया
ख़ाली पड़ा है ताक़ दिया कौन ले गया
इस शहर में तो कोई सुलैमान भी नहीं
मैं क्या बताऊँ तख़्त-ए-सबा कौन ले गया
दुश्मन अक़ब में आ भी गया और अभी तलक
तुम को ख़बर नहीं है असा कौन ले गया
अपने बदन से लिपटा हुआ आदमी था मैं
मुझ से छुड़ा के मुझ को बता कौन ले गया
'गौहर' ये माजरा तो परिंदों से पूछना
पेड़ों को क्या पता है हवा कौन ले गया
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पनाह-गाह मुझे भी तो सौर जैसी दे
मिरी तलाश में दुश्मन हैं ताज़ा-दम मेरे
तुझे मैं कैसे बताऊँ कहाँ से कैसा हूँ
उलझ रहे हैं ब-दस्तूर पेच-ओ-ख़म मेरे
किस आसमान की वुसअत तलाश करते हुए
ज़मीं से दूर निकल आए हैं क़दम मेरे
तू ये सवाल भी अब दजला ओ फ़ुरात से पूछ
मैं क्या बताऊँ कहाँ लुट गए हरम मेरे
जमी रही है चटानों पे बर्फ़ सदियों तक
तो जा के फिर कहीं पत्थर हुए हैं नम मेरे
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मैं सुन रहा हूँ जो दुनिया सुना रही है मुझे
हँसी तो अपनी ख़मोशी पे आ रही है मुझे
हँसी तो अपनी ख़मोशी पे आ रही है मुझे
मिरे वजूद की मिट्टी में ज़र नहीं कोई
ये इक चराग़ की लौ जगमगा रही है मुझे
ये कैसे ख़्वाब की ख़्वाहिश में घर से निकला हूँ
कि दिन में चलते हुए नींद आ रही है मुझे
कोई सहारा मुझे कब सँभाल सकता है
मिरी ज़मीन अगर डगमगा रही है मुझे
मैं इस जहान में ख़ुश हूँ मगर कोई आवाज़
नए जहान की जानिब बुला रही है मुझे
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देर तक कोई किसी से बद-गुमाँ रहता नहीं
वो वहाँ आता तो होगा मैं जहाँ रहता नहीं
वो वहाँ आता तो होगा मैं जहाँ रहता नहीं
एक मैं हूँ धूप में कितना सफ़र तय कर लिया
एक तू है जो कभी बे-साएबाँ रहता नहीं
तुम को क्यूँ पेड़ों पे लिक्खे नाम मिटने का है दुख
इस बदलती रुत में पत्थर पर निशाँ रहता नहीं
वो बना लेता है अपना घोंसला दीवार में
जिस परिंदे का शजर में आशियाँ रहता नहीं
तू परिंदों की तरह उड़ने की ख़्वाहिश छोड़ दे
बे-ज़मीं लोगों के सर पर आसमाँ रहता नहीं
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सब को बता रहा हूँ यही साफ़ साफ़ मैं
जलते दिए से कैसे करूँ इंहिराफ़ में
जलते दिए से कैसे करूँ इंहिराफ़ में
मैं ने तो आसमान के रंगों की बात की
कहने लगी ज़मीन बदल दूँ ग़िलाफ़ में
गुमराह कब किया है किसी राह ने मुझे
चलने लगा हूँ आप ही अपने ख़िलाफ़ में
मिलता नहीं है फिर भी सिरा आसमान का
कर कर के थक चुका हूँ ज़मीं का तवाफ़ में
अब तू भी आइने की तरह बोलने लगा
पत्थर से भर न दूँ तिरे मुँह का शिगाफ़ में
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ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले
बर्फ़ से उठता हुआ एक धुआँ था पहले
बर्फ़ से उठता हुआ एक धुआँ था पहले
मुझ से आबाद हुई है तिरी दुनिया वर्ना
इस ख़राबे में कोई और कहाँ था पहले
एक ही दाएरे में क़ैद हैं हम लोग यहाँ
अब जहाँ तुम हो कोई और वहाँ था पहले
उस को हम जैसे कई मिल गए मजनूँ वर्ना इश्क़ लोगों के लिए कार-ए-ज़ियाँ था पहले
ये जो अब रेत नज़र आता है अफ़ज़ल 'गौहर'
इसी दरिया में कभी आब-ए-रवाँ था पहले
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नींद आई न खुला रात का बिस्तर मुझ से
गुफ़्तुगू करता रहा चाँद बराबर मुझ से
गुफ़्तुगू करता रहा चाँद बराबर मुझ से
अपना साया उसे ख़ैरात में दे आया हूँ
धूप के डर से जो लिपटा रहा दिन भर मुझ से
कौन सी ऐसी कमी मेरे ख़द-ओ-ख़ाल में है
आइना ख़ुश नहीं होता कभी मिल कर मुझ से
क्या मुसीबत है कि हर दिन की मशक़्क़त के एवज़
बाँध जाता है कोई रात का पत्थर मुझ से
दश्त की सम्त निकल आया है मेरा दरिया
बस इसी पर हैं ख़फ़ा सारे समुंदर मुझ से
अपने हाथों को जो कश्कोल बनाया 'गौहर'
गिर पड़ा जाने कहाँ मेरा मुक़द्दर मुझ से
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चंद लोगों की मोहब्बत भी ग़नीमत है मियाँ
शहर का शहर हमारा तो नहीं हो सकता
कब तलक क़ैद रखूँ आँख में बीनाई को
सिर्फ़ ख़्वाबों से गुज़ारा तो नहीं हो सकता
रात को झेल के बैठा हूँ तो दिन निकला है
अब मैं सूरज से सितारा तो नहीं हो सकता
दिल की बीनाई को भी साथ मिला ले 'गौहर'
आँख से सारा नज़ारा तो नहीं हो सकता
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