Ahmad Mahfuz

Top 10 of Ahmad Mahfuz

    सर-ब-सर पैकर-ए-इज़हार में लाता है मुझे
    और फिर ख़ुद ही तह-ए-ख़ाक छुपाता है मुझे

    कब से सुनता हूँ वही एक सदा-ए-ख़ामोश
    कोई तो है जो बुलंदी से बुलाता है मुझे

    रात आँखों में मिरी गर्द-ए-सियह डाल के वो
    फ़र्श-ए-बे-ख़्वाबी-ए-वहशत पे सुलाता है मुझे

    गुम-शुदा मैं हूँ तो हर सम्त भी गुम है मुझ में
    देखता हूँ वो किधर ढूँडने जाता है मुझे

    दीदनी है ये तवज्जोह भी ब-अंदाज़-ए-सितम
    उम्र भर शीशा-ए-ख़ाली से पिलाता है मुझे

    हमा-अंदेशा-ए-गिर्दाब ब-पहलू-ए-नशात
    मौज-दर-मौज ही साहिल नज़र आता है मुझे
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    किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था
    तो मैं ने ख़ेमा-ए-शब से किसे पुकारा था

    कहाँ किसी को थी फ़ुर्सत फ़ुज़ूल बातों की
    तमाम रात वहाँ ज़िक्र बस तुम्हारा था

    मकाँ में क्या कोई वहशी हवा दर आई थी
    तमाम पैरहन-ए-ख़्वाब पारा पारा था

    उसी को बार-ए-दिगर देखना नहीं था मुझे
    मैं लौट आया कि मंज़र वही दोबारा था

    सुबुक-सरी ने गिरानी अजीब की दिल पर
    है अब ये बोझ कि वो बोझ क्यूँ उतारा था

    शब-ए-सियाह सफ़र ये भी राएगाँ तो नहीं
    वो क्या हुआ जो मिरे साथ इक सितारा था
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    सवाद-ए-शाम न रंग-ए-सहर को देखते हैं
    बस इक सितारा-ए-वहशत-असर को देखते हैं

    किसी के आने की जिस से ख़बर भी आती नहीं
    न जाने कब से उसी रहगुज़र को देखते हैं

    ख़ुदा-गवाह कि आईना-ए-नफ़स ही में हम
    ख़ुद अपनी ज़िंदगी-ए-मुख़्तसर को देखते हैं

    तो क्या बस एक ठिकाना वही है दुनिया में
    वो दर नहीं तो किसी और दर को देखते हैं

    सुना है शहर का नक़्शा बदल गया 'महफ़ूज़'
    तो चल के हम भी ज़रा अपने घर को देखते हैं
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    उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है
    कुछ और है ये वो शय नहीं है

    कश्ती तो रवाँ है कब से शब की
    किस घाट लगेगी तय नहीं है

    क्या दिल में बसाऊँ तेरी सूरत
    आईने में अक्स है नहीं है

    दामन को ज़रा झटक तो देखो
    दुनिया है कुछ और शय नहीं है

    आहंग-ए-सुकूत दम-ब-दम सुन
    ये साज़-ए-नफ़स है नय नहीं है
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    Ahmad Mahfuz
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    उधर से आए तो फिर लौट कर नहीं गए हम
    पुकारती रही दुनिया मगर नहीं गए हम

    अगरचे ख़ाक हमारी बहुत हुई पामाल
    ब-रंग-ए-नक़्श-ए-कफ़-ए-पा उभर नहीं गए हम

    हुसूल कुछ न हुआ जुज़ ग़ुबार-ए-हैरानी
    कहाँ कहाँ तिरी आवाज़ पर नहीं गए हम

    मना रहे थे वहाँ लोग जश्न-ए-बे-ख़्वाबी
    यहाँ थे ख़्वाब बहुत सो उधर नहीं गए हम

    चढ़ा हुआ था वो दरिया अगर हमारे लिए
    तो देखते ही रहे क्यूँ उतर नहीं गए हम
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    Ahmad Mahfuz
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    आया ही नहीं कोई बोझ अपना उठाने को
    कब तक मैं छुपा रखता इस ख़्वाब-ख़ज़ाने को

    देखा नहीं रुख़ करते जिस तरफ़ ज़माने को
    जी चाहता है अक्सर उस सम्त ही जाने को

    ये शग़्ल-ए-ज़बानी भी बे-सर्फ़ा नहीं आख़िर
    सौ बात बनाता हूँ इक बात बनाने को

    इस कुंज-ए-तबीअत की मुमकिन है हवा बदले
    झोंका कोई आ जाए पत्ते ही उड़ाने को

    राज़ी न हुआ मैं भी मानूस मनाज़िर पर
    तय्यार न था वो भी कुछ और दिखाने को

    जैसा कि समझते हो वैसा तो नहीं कुछ भी
    ये सारा तमाशा है इक वहम मिटाने को
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    Ahmad Mahfuz
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    अब इस मकाँ में नया कोई दर नहीं करना
    ये काम सहल बहुत है मगर नहीं करना

    ज़रा ही देर में क्या जाने क्या हो रात का रंग
    सो अब क़याम सर-ए-रहगुज़र नहीं करना

    बयाँ तो कर दूँ हक़ीक़त उस एक रात की सब
    प शर्त ये है किसी को ख़बर नहीं करना

    रफ़ूगरी को ये मौसम है साज़गार बहुत
    हमें जुनूँ को अभी जामा-दर नहीं करना

    ख़बर है गर्म किसी क़ाफ़िले के लुटने की
    ये वाक़िआ' है तो सैर ओ सफ़र नहीं करना
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    Ahmad Mahfuz
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    छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ
    अपना तो सब के हाथों ख़सारा बहुत हुआ

    क्या बे-सबब किसी से कहीं ऊबते हैं लोग
    बावर करो कि ज़िक्र तुम्हारा बहुत हुआ

    बैठे रहे कि तेज़ बहुत थी हवा-ए-शौक़
    दश्त-ए-हवस का गरचे इरादा बहुत हुआ

    आख़िर को उठ गए थे जो इक बात कह के हम
    सुनते हैं फिर उसी का इआदा बहुत हुआ

    मिलने दिया न उस से हमें जिस ख़याल ने
    सोचा तो इस ख़याल से सदमा बहुत हुआ

    अच्छा तो अब सफ़र हो किसी और सम्त में
    ये रोज़-ओ-शब का जागना सोना बहुत हुआ
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    वो इक सवाल-ए-सितारा कि आसमान में था
    तमाम रात ये दिल सख़्त इम्तिहान में था

    सुकूँ सराब ज़मीं में झुलस गया था बदन
    न जाने कौन धनक-रंग साएबान में था

    ज़रा सा दम न लिया था कि मुँद गईं आँखें
    मैं इस सफ़र से निकल कर अजब तकान में था

    वो जाते जाते अचानक मुड़ा था मेरी तरफ़
    मुझे यक़ीं है कि वो फिर किसी गुमान में था

    उसे भुलाया तो अपना ख़याल भी न रहा
    कि मेरा सारा असासा इसी मकान में था
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    ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास
    क्या कोई आग बुझ गई सरहद-ए-जाँ के आस-पास

    शोर-ए-हवा-ए-शाम-ए-ग़म यूँ तो कहाँ कहाँ नहीं
    सुनिए तो बस सुनाई दे दर्द-ए-निहाँ के आस-पास

    बुझ गए क्या चराग़ सब ऐ दिल-ए-आफ़ियत-तलब
    कब से भटक रहे हैं हम कू-ए-ज़ियाँ के आस-पास

    उन को तलाश कीजिए हम तो मिलेंगे आप ही
    अपनी भी जा-ए-बाश है गुम-शुदगाँ के आस-पास

    सीना-ए-शब को चीर कर देखो तो क्या समाँ है अब
    मंज़िल-ए-दिल के सामने कूचा-ए-जाँ के आस-पास

    वो भी अजब सवार था आया इधर उधर गया
    पहुँची न मेरी ख़ाक भी उस की इनाँ के आस-पास

    आलम-ए-सर्द-ओ-गर्म की क्या हो भला उन्हें ख़बर
    वो जो रहे हैं उम्र भर शोला-रुख़ाँ के आस-पास
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    Ahmad Mahfuz
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