Badar Shamsi

Badar Shamsi

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Badar Shamsi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Badar Shamsi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
तुम अपने साथ मिरी चश्म-ए-तर भी ले जाओ
सफ़र तवील है इक हम-सफ़र भी ले जाओ

नज़र में रौनक़-ए-दीवार-ओ-दर भी ले जाओ
ये क्या कि दश्त-नवर्दी में घर भी ले जाओ

इन आंधियों में भरोसा ही क्या चराग़ों का
सजा के अपनी हथेली पे सर भी ले जाओ

तुम अपनी रात सजाओ नए उजालों से
हमारा क्या है हमारा सहर भी ले जाओ

मिलेंगे ज़ख़्म बहुत ज़िंदगी के मेले में
तुम अपने साथ हमारा जिगर भी ले जाओ

मैं एक राह का पत्थर सही मगर लोगो
कभी मुझे किसी आज़र के घर भी ले जाओ

तुम्हारे हाथ की ख़ुशबू ज़रूर महकेगी
हमारी ख़ाक से कोई शरर भी ले जाओ

मैं ज़िंदगी के अँधेरों का दर्द सह लूँगा
तुम अपनी याद के शम्स-ओ-क़मर भी ले जाओ

मैं 'बद्र' ख़ुद ही मसीहा हूँ अपने ज़ख़्मों का
ये जुर्म है तो मुझे दार पर भी ले जाओ
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Badar Shamsi
पैमान-ए-वफ़ा तोड़ के जाने के लिए आ
आ दिल की लगी और बढ़ाने के लिए आ

पामाल ही कर ज़ुल्म ही ढाने के लिए आ
मुझ को मिरा एहसास दिलाने के लिए आ

नौ-ख़ेज़ बहारों से मिरे दिल को सजा दे
ज़ख़्मों के नए फूल खिलाने के लिए आ

कब से ग़म-ए-हालात की राहों में पड़ा हूँ
तू भी कोई ठोकर ही लगाने के लिए आ

फूलों का तक़ाज़ा तो नहीं दस्त-ए-करम से
काँटे मिरी राहों में बिछाने के लिए आ

हो तंज़ की बारिश भी तवज्जोह की अदा से
ऐ अब्र-ए-करम आग लगाने के लिए आ

अब ख़ुद को भुलाऊँ कि तुझे याद करूँ मैं
ऐ हासिल-ए-ग़म इतना बताने के लिए आ

लिक्खा है मिरा नाम तिरे दिल के वर्क़ पर
मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटाने के लिए आ

हर ज़ख़्म दिल-ए-'बद्र' को इक ताज़ा ख़लिश दे
लौ बुझते चराग़ों की बढ़ाने के लिए आ
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Badar Shamsi
कितना अजीब शहर-ए-तमन्ना दिखाई दे
है इतनी रौशनी कि अंधेरा दिखाई दे

ता'बीर किस से पूछिए उस ख़्वाब-ए-शौक़ की
जो ख़्वाब देखिए तो अधूरा दिखाई दे

अब आम हो चली है यही रस्म-ए-ज़िंदगी
हर शख़्स अपने दर्द का मारा दिखाई दे

उभरे मिरे दरीचा-ए-दिल से वो चाँद जब
सूरज भी सामने हो तो ढलता दिखाई दे

इस शहर-ए-आरज़ू में अजब ख़ुश-नज़र हैं लोग
बख़्शे जो दिल को दर्द मसीहा दिखाई दे

जिस अंजुमन में सब की नज़र हो तिरी तरफ़
उस अंजुमन में कौन किसी का दिखाई दे

कितनी अजीब चोट है ये दिल की चोट भी
भरने लगे जो ज़ख़्म वो गहरा दिखाई दे

तुझ से अलग नहीं है कोई रंग-ए-दिल-कशी
हर रंग तेरे रंग में ढलता दिखाई दे

दिल में न हो जो दाग़-ए-तमन्ना की रौशनी
ऐ 'बद्र' ज़िंदगी में अँधेरा दिखाई दे
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Badar Shamsi
अब उन का ग़म भी हमें दिल-कुशा सा लगता है
ये अजनबी तो हमें आश्ना सा लगता है

फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-रस्म-ए-वफ़ा सा लगता है
ये ज़ख़्म-ए-दिल कि जो हँसता हुआ सा लगता है

ख़ुद अपने दिल से तराशा है जो सनम मैं ने
ख़ुदा नहीं है वो लेकिन ख़ुदा सा लगता है

मिला है जिस को मिरी बंदगी का हुस्न-ए-ख़ुलूस
वो नक़्श-ए-सज्दा तिरे नक़्श-ए-पा सा लगता है

कभी कभी तिरी यादों की अंजुमन में ये दिल
ख़ुद अपने आप से रूठा हुआ सा लगता है

रुख़-ए-हयात ये हल्का सा इक तबस्सुम भी
ग़म-ए-हयात का मारा हुआ सा लगता है

बदल गई है ये किस की नज़र ख़ुदा जाने
रुख़-ए-हयात बदलता हुआ सा लगता है

ये दाग़-ए-दिल हैं कि ऐ 'बद्र' हसरतों के सनम
ख़ुदा का घर है मगर बुत-कदा सा लगता है
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Badar Shamsi
नज़र बचा के नज़र से गुज़र गया वो शख़्स
मिरे वजूद में लेकिन उतर गया वो शख़्स

जो ज़िंदगी की अलामत था इक ज़माने से
सुना है आज ख़ुद अपने में मर गया वो शख़्स

कहीं भी कम न हुआ उस का दर्द-ए-तन्हाई
समुंदरों से भी प्यासा गुज़र गया वो शख़्स

न जाने कब से सँभाले हुए था जो ख़ुद को
न जाने आज ये कैसे बिखर गया वो शख़्स

तुलूअ'-ए-दर्द हुआ आफ़्ताब-ए-नौ की तरह
शब-ए-अलम की फ़ज़ा में निखर गया वो शख़्स

सजाए अश्क ज़माने के अपनी आँखों में
मगर ख़ुद अपने तबस्सुम से डर गया वो शख़्स

पुकारती थी उसे बे-चराग़ राहगुज़र
तमाम करके जब अपना सफ़र गया वो शख़्स

हर एक चेहरा है बे-चेहरगी का आईना
अभी जो 'बद्र' यहाँ था किधर गया वो शख़्स
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Badar Shamsi
यूँ बिछड़ जाऊँगा तुम से मैं ने ये सोचा न था
क़ुर्बतों में फ़ासलों का कोई अंदाज़ा न था

जाने पहचाने हुए चेहरे भी सब थे अजनबी
कितना तन्हा था वहाँ भी मैं जहाँ तन्हा न था

अपने दिल का ज़हर-ए-ग़म आँखों से जो छलका गया
वो समुंदर था मगर मेरी तरह गहरा न था

ज़िंदगी हम भी तिरी क़द्रों के वारिस थे मगर
अपनी क़िस्मत में फ़क़त दीवार थी साया न था

हर तरफ़ है अब मिरी ख़ामोशियों की बाज़गश्त
ज़िंदगी में इस से पहले इतना सन्नाटा न था

रूठने वाले मिरी चाहत का अंदाज़ा तो कर
इस क़दर तो मैं ने ख़ुद को भी कभी चाहा न था

ज़ख़्म भी जिस ने दिए हैं मुझ को ग़ैरों की तरह
वो मिरा अपना था लेकिन मुझ को पहचाना न था

प्यार आख़िर क्यों न आता अपने क़ातिल पर मुझे
मेरे उस के दरमियाँ क्या ख़ून का रिश्ता न था

बे-वफ़ाई की शिकायत थी मुझे उस से मगर
उस की मजबूरी को जब तक 'बद्र' मैं समझा न था
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Badar Shamsi
मैं चराग़-ए-शब-ए-हस्ती हूँ ज़िया क्या माँगूँ
ज़िंदा रहना है तो चलने के सिवा क्या माँगूँ

तोहफ़ा-ए-चाक-ए-गरेबाँ के सिवा क्या माँगूँ
तुझ से ऐ फ़स्ल-ए-जुनूँ तू ही बता क्या माँगूँ

मैं ने चाहा है तुझे अपने इरादों की तरह
और मैं अपने इरादों का सिला क्या माँगूँ

फूल में नूर नहीं चाँद में ख़ुशबू ही नहीं
इन नज़ारों से तिरा हुस्न-ए-अदा क्या माँगूँ

कितने आँसू हैं मिरे ग़म को सजाने के लिए
आज की रात सितारों से ज़िया क्या माँगूँ

अपने ही ख़ून में डूबा हुआ पैकर हूँ मैं
मैं किसी और से रंगीन क़बा क्या माँगूँ

ज़ख़्म-ए-एहसास लहू दे तो बहार आती है
ग़ुंचा-ए-दिल के लिए मौज-ए-सबा क्या माँगूँ

मेरी क़िस्मत में तो शायद कोई पत्थर भी नहीं
वहशत-ए-दिल का किसी से मैं सिला क्या माँगूँ

दिल का हर दाग़-ए-तमन्ना है चराग़-ए-मंज़िल
'बद्र' मैं चाँद-सितारों से ज़िया क्या माँगूँ
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