Unwan Chishti

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Unwan Chishti shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Unwan Chishti's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
तअ'स्सुब की फ़ज़ा में ता'ना-ए-किरदार क्या देता
मुनाफ़िक़ दोस्तों के हाथ में तलवार क्या देता

अमीर-ए-शहर तो ख़ुद ज़र्द-रू था एक मुद्दत से
झरोके से वो अहल-ए-शहर को दीदार क्या देता

हमारे दिन को जो देता नहीं इक धूप का टुकड़ा
हमारी रात को वो चाँद का मेआ'र क्या देता

कहीं गोली कहीं गाली मोहब्बत से है दिल ख़ाली
ख़बर ये थी तो बच्चों को नया अख़बार क्या देता

बहुत दुश्वार है ख़ुद्दार रह कर ज़िंदगी करना
ख़ुशामद करने वाला सदक़ा-ए-दस्तार क्या देता

ख़ुद उस का साया भी उस से गुरेज़ाँ है मुसीबत में
मिरा हम-साया मुझ को साया-ए-दीवार क्या देता

सराए-जाँ में दानिस्ता मुसाफ़िर लुट गया वर्ना
कि दिल सा सख़्त-जाँ इक गुल-बदन को वार क्या देता
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Unwan Chishti
कहते हैं अज़ल जिस को उस से भी कहीं पहले
ईमान मोहब्बत पर लाए थे हमीं पहले

असरार-ए-ख़ुद-आगाही दीवाने समझते हैं
तकमील-ए-जुनूँ आख़िर मेराज-ए-यक़ीं पहले

चमका दिया सज्दों ने नक़्श-ए-कफ़-ए-पा लेकिन
रौशन तो न थी इतनी ये मेरी जबीं पहले

हर बार ये रह रह कर होता है गुमाँ मुझ को
शायद तिरे जल्वों को देखा था कहीं पहले

ये बात अलग ठहरी अब हम को न पहचानें
महफ़िल में मगर उन की आए थे हमीं पहले

ये राज़-ए-मोहब्बत है समझेगा ज़माना क्या
तुम हासिल-ए-दीं आख़िर ग़ारत-गर-ए-दीं पहले

इस कार-ए-नुमायाँ के शाहिद हैं चमन वाले
गुलशन में बहारों को लाए थे हमीं पहले

तक़दीर की मुख़्तारी 'उनवान' मुसल्लम है
होती है मोहब्बत भी मजबूर यहीं पहले
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Unwan Chishti
रहने दे तकलीफ़-ए-तवज्जोह दिल को है आराम बहुत
हिज्र में तेरी याद बहुत है ग़म में तेरा नाम बहुत

बात कहाँ उन आँखों जैसी फूल बहुत हैं जाम बहुत
औरों को सरशार बनाएँ ख़ुद हैं तिश्ना-काम बहुत

कुछ तो बताओ ऐ फ़रज़ानो दीवानों पर क्या गुज़री
शहर-ए-तमन्ना की गलियों में बरपा है कोहराम बहुत

शुग़्ल-ए-शिकस्त-ए-जाम-ओ-तौबा पहरों जारी रहता है
हम ऐसे ठुकराए हुओं को मय-ख़ाने में काम बहुत

दिल-शिकनी ओ दिलदारी की रम्ज़ों पर ही क्या मौक़ूफ़
उन की एक इक जुम्बिश-ए-लब में पिन्हाँ हैं पैग़ाम बहुत

आँसू जैसे बादा-ए-रंगीं धड़कन जैसे रक़्स-ए-परी
हाए ये तेरे ग़म की हलावत रहता हूँ ख़ुश-काम बहुत

उस के तक़द्दुस के अफ़्साने सब की ज़बाँ पर जारी हैं
उस की गली के रहने वाले फिर भी हैं बदनाम बहुत

ज़ख़्म ब-जाँ है ख़ाक बसर है चाक ब-दामाँ है 'उनवाँ'
बज़्म-ए-जहाँ में रक़्स-ए-वफ़ा पर मिलते हैं इनआम बहुत
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