इश्क़ में गुज़रे थे ऐसे इक दौर से
मैं किसी और से वो किसी और से
कुछ न कुछ मुश्किलें ही हुई हैं खड़ी
जब भी देखा गया है मुझे ग़ौर से
मैं ने इज़हार अब कर दिया इश्क़ का
उस ने हाँ भी कहा पर किसी और से
हर घड़ी हिचकियाँ आएँगी बस तुम्हें
मेरी ग़ज़लें पढ़े जो कोई ग़ौर से
हम ने दोहरा लिए पिछले बाइस बरस
रात कटती नहीं ये किसी तौर से
— Yamir Ahsan















