यूँँ तिरा दिल पर मिरे क़ब्ज़ा रहा है

साँस तक रुकने का भी ख़तरा रहा है

जब हुए तक़्सीम रंज-ओ-ग़म जहाँ में
उस में तो मेरा भी इक हिस्सा रहा है

चैन मुझ को जनवरी से फिर मिलेगा
तेरी यादों का दिसम्बर जा रहा है

जो नहीं चलता रहे अस्लाफ़ पर तो
उस को फिर हर काम में घाटा रहा है

गुल खिला कर शा'इरी के गुलसिताँ में
ये 'ज़फर' भी अब फ़ज़ा महका रहा है

— Zafar Siddqui

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Phool Shayari

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