हम ने तो ख़ूब ज़ब्त से टाले निकल पड़े
सँभले नहीं ये अश्क सँभाले निकल पड़े
किस को रहा है दोस्त यूँ घर छोड़ने का शौक़
हम तो ज़रूरतों के निकाले निकल पड़े
जब उस ने रफ़्ता-रफ़्ता यहाँ घर बना लिया
मायूस हो के क़ल्ब से जाले निकल पड़े
किस ने कुरेद डाली मेरे जुगनुओं की राख
तीरा-शबी की तह से उजाले निकल पड़े
उस ने जो तर्क-ए-इश्क़ का ऐलान कर दिया
मेरे जिगर पे सैकड़ों छाले निकल पड़े
हम तो समझ रहे थे तुम्हें अपनी मिल्कियत
लेकिन ये किस के नाम क़बाले निकल पड़े
फूलों में रंग-ओ-रस की कोई बात छिड़ गई
ले-दे के याँ भी तेरे हवाले निकल पड़े।
जब हद से बढ़ गईं तेरी ज़र्रा-नवाज़ियाँ
आख़िर मेरी ज़बान से नाले निकल पड़े
लश्कर उदासियों का मुक़ाबिल जो आ गया
अपनी क़बाएँ कस के जियाले निकल पड़े
जब बज़्म से हम उस की निकाले गए 'करन'
हम ने ख़ुतूत उस के उछाले निकल पड़े















