KARAN
KARAN
Ghazal

हम ने तो ख़ूब ज़ब्त से टाले निकल पड़े

सँभले नहीं ये अश्क सँभाले निकल पड़े

किस को रहा है दोस्त यूँ घर छोड़ने का शौक़
हम तो ज़रूरतों के निकाले निकल पड़े

जब उस ने रफ़्ता-रफ़्ता यहाँ घर बना लिया
मायूस हो के क़ल्ब से जाले निकल पड़े

किस ने कुरेद डाली मेरे जुगनुओं की राख
तीरा-शबी की तह से उजाले निकल पड़े

उस ने जो तर्क-ए-इश्क़ का ऐलान कर दिया
मेरे जिगर पे सैकड़ों छाले निकल पड़े

हम तो समझ रहे थे तुम्हें अपनी मिल्कियत
लेकिन ये किस के नाम क़बाले निकल पड़े

फूलों में रंग-ओ-रस की कोई बात छिड़ गई
ले-दे के याँ भी तेरे हवाले निकल पड़े।

जब हद से बढ़ गईं तेरी ज़र्रा-नवाज़ियाँ
आख़िर मेरी ज़बान से नाले निकल पड़े

लश्कर उदासियों का मुक़ाबिल जो आ गया
अपनी क़बाएँ कस के जियाले निकल पड़े

जब बज़्म से हम उस की निकाले गए 'करन'
हम ने ख़ुतूत उस के उछाले निकल पड़े

— KARAN

More by KARAN

Other ghazal from the same pen

See all from KARAN →

Shama Shayari Collection

Shers of shama shayari collection.

All Shama Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling