आप कहो क्या ग़ज़ल लिखूँ मैं, जब हो आप ग़ज़ाला बिल्कुल

गीले बालों में लगते हो, मय का जैसे प्याला बिल्कुल

ठीक नहीं हालात जरा भी, होंठों पे मुस्कान सदा पर
तुम ने पूछा अच्छे से हो?, मैं ने भी कह डाला, बिल्कुल

हर कोशिश बेकार पड़ गई, कुछ कर लूँ मैं छूट न पाऊँ
तेरा इश्क़ लगे मुझ को तो मकड़ी का है जाला बिल्कुल

अक्स मिरा तुझ में उतरा है, देख जरा मेरी आँखों से
तेरे कांधे पर जो तिल है, मेरी तरहा काला बिल्कुल

अब मेरा क्या मुझ में बाक़ी, तेरा-मेरा क्या करते हो
मैं ख़ुद तेरे नाम हुआ हूँ, तेरे नाम क़बाला बिल्कुल

इक दूजे से हैराँ क्यूँ हैं, दोनों में अँधियारा क्यूँ है
बाहों में भर ले मुझ को जो, हो भरपूर उजाला बिल्कुल

— Naresh Gund

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