साथ होकर भी हमेशा दूर पाया है तुझे
है ख़ता मेरी कि मैं ने आज़माया है तुझे
रोज़ ही करता रहा मैं रक़्स तेरी याद में
टूटने तक तार दिल के रोज़ गाया है तुझे
अजनबी बन कर मिलूँगा जब मिलूँगा फिर कभी
सोच कर ये बात मुश्किल से भुलाया है तुझे
मुद्दतों के बा'द उतरी है ज़मीं पर चाँदनी
ख़्वाहिशों का तोड़ कर गुल्लक, बुलाया है तुझे
क्या बताऊँ किस क़दर खाती है उस को बेबसी
रोज़गारी के लिए जो छोड़ आया है तुझे
चाँद सा महबूब पा कर ये कभी मत भूलना
चाँद की लोरी सुना माँ ने सुलाया है तुझे
आग में जल कर मिला क्या बोल दो सीते ज़रा
रावणों को छोड़ कर हम ने जलाया है तुझे
— Naresh Gund















