सबकी अपनी चाल अलग है
दुनिया का भी हाल अलग है
क़िस्मत जैसे के तैसे है
दिन वैसे ही, साल अलग है
चेक-मेट राजा को कर दे
इस प्यादे की चाल अलग है
पैसों पर नाचे हर बुलबुल
हर सिक्के का ताल अलग है
गेंडे की चमड़ी शर्माएँ
इन्सानों की खाल अलग है
कुर्सी से चिपके बैठे हैं
तशरीफ़ों पर राल अलग है
गड़बड़ घोटालों की नगरी
कलियुग है, ये काल अलग है
इक थाली के चट्टे-बट्टे
काली सबकी दाल, अलग है
सारे फूलों को चूमो तुम
पर मेरा ये गाल अलग है
मेरा जिस से गला कटा है
सच कहता हूँ बाल अलग है
ग़ुस्सा, क़ुर्बानी-ओ-चाहत
अपना अपना लाल अलग है
सबकी नज़रों में नाकारा
माँ को अपना लाल अलग है
— Naresh Gund















