बात फिर तेरी चली है
याद फिर आगे खड़ी है
यार देखो सोच कर तुम
आई ये कैसी घड़ी है
शा'इरी बस है ज़रूरी
ज़िंदगी कब क़ीमती है
हाॅं वफ़ा ने मार डाला
लाश देखो ये पड़ी है
पूछना था क्या हुआ था
बात जो इतनी बढ़ी है
देख कर हैरत में हूँ मैं
आँख उस की भी डरी है
— Amanpreet singh















