मुझ को तो आशिक़ी नहीं आती
हाँ मुझे ख़ुद-कुशी नहीं आती
यूँ तो आती है याद माज़ी की
और तू है कभी नहीं आती
कैसे आते हैं ख़्वाब यूँ तुम को
हम को तो नींद भी नहीं आती
जी लो जी भर के ज़िन्दगी यारों
लौट कर ज़िन्दगी नहीं आती
इक इमारत ने रोक रक्खा है
रौशनी शम्स की नहीं आती
कैसे लिक्खोगे तुम ग़ज़ल 'चंदन'
गर तुम्हें शा'इरी नहीं आती
— Manoj Sharma "Chandan"















