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दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है  - Ahmad Ata

दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है
ये अस्ल में कोई तीसरा है

तुझ बिन ये मिरा वजूद क्या है
इक पेड़ है और खोखला है

इक चाप सुनाई दे रही है
दरवाज़े से वो पलट गया है

वो एक दिन इंतिज़ार का दिन
फिर ज़िंदगी भर वो दिन रहा है

ताबीर बताई जा चुकी है
अब आँख को ख़्वाब देखना है

बस धुँद निगल चुकी है ये रात
नज़्ज़ारा तमाम हो चुका है

- Ahmad Ata

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