pehle ham ashk the phir deeda-e-nam-naak hue | पहले हम अश्क थे फिर दीदा-ए-नम-नाक हुए

  - Ahmad Ata

पहले हम अश्क थे फिर दीदा-ए-नम-नाक हुए
इक जू-ए-आब-ए-रवाँ हाथ लगी पाक हुए

और फिर सादा-दिली दिल में कहीं दफ़्न हुई
और फिर देखते ही देखते चालाक हुए

और फिर शाम हुई रंग खिले जाम भरे
और फिर ज़िक्र छिड़ा थोड़े से ग़मनाक हुए

और फिर आह भरी अश्क बहे शेर कहे
और फिर रक़्स किया धूल उड़ी ख़ाक हुए

और फिर हम कसी पा-पोश का पैवंद बने
और फिर अपने भी चर्चे सर-ए-अफ़्लाक हुए

और फिर याद किया इस्म पढ़ा फूँक दिया
और फिर कोह-ए-गिराँ भी ख़स-ओ-ख़ाशाक हुए

  - Ahmad Ata

Pollution Shayari

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    उस ख़ुदा-ए-लम-यज़ल ने और ही तक़दीर की

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    मैं तो मिट्टी हो रहा था इश्क़ में लेकिन 'अता'
    आ गई मुझ में कहीं से बे-दिमाग़ी 'मीर' की
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    Ahmad Ata
    मैं तिरी मानता लेकिन जो मिरा दिल है ना
    दर का पत्थर है हटाना इसे मुश्किल है ना

    ये तिरा हुस्न कुछ ऐसा नहीं पूजें जिस को
    लेकिन ऐ यार तिरे गाल का जो तिल है ना

    जो मिरे वास्ते दिन रात दुआ करते हैं
    दुश्मन-ए-जाँ ये बता उन में तू शामिल है ना

    माँगना आता नहीं और ख़ुदा कहता है
    ऐ फ़रिश्तो इसे देखो ये जो साइल है ना

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    कि वही एक क़सीदा तिरे क़ाबिल है ना
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    Ahmad Ata
    दोनों के जो दरमियाँ ख़ला है
    ये अस्ल में कोई तीसरा है

    तुझ बिन ये मिरा वजूद क्या है
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    फिर ज़िंदगी भर वो दिन रहा है

    ताबीर बताई जा चुकी है
    अब आँख को ख़्वाब देखना है

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    Ahmad Ata
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    Ahmad Ata
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    कि उस के साथ भी यूँही किनारे जैसे हैं

    तिलिस्म-ए-चश्म सलामत रहे कि जिस के सबब
    कहीं हैं फूल कहीं हम सितारे जैसे हैं

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    वो जानता है हम उस को ख़सारे जैसे हैं

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    ब-वक़्त-ए-गिर्या हम ऐसे थे, सारे जैसे हैं

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    कहो क़दम धरे, छोड़े उतारे जैसे हैं

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    Ahmad Ata

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