खुली और बंद आँखों से उसे तकता रहा मैं भी

तिरी दुनिया के पीछे भागता फिरता रहा मैं भी

मिरी आवाज़ पिछली रात तुझ तक कैसे आ पाती
किसी गहरे कुएँ में रात भर सोता रहा मैं भी

ब-ज़ाहिर देखती आँखें ब-ज़ाहिर जागती रूहें
ब-ज़ाहिर इन सभों के साथ ही जीता रहा मैं भी

मैं हूँ इस कारसाज़-ए-बे-कसाँ की दस्तरस में यूँ
वो जिस साँचे में भी ढाला किया ढलता रहा मैं भी

बदन मल्बूस में शो'ला सा इक लर्ज़ां क़रीन-ए-जाँ
दिल-ए-ख़ाशाक भी शो'ला हुआ जलता रहा मैं भी

है जिस राह-ए-यक़ीं पर गामज़न पा-ए-ख़िरद हर-दम
उसी राह-ए-गुमाँ पर मुद्दतों चलता रहा मैं भी

— Akram Naqqash

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