हैरान हो रहा हूँ बसीरत के नाम पर
मैं देखता कुछ और हूँ मंज़र कुछ और है
मुझ को सितारा और कोई खींचता है क्यूँ
मेरा इलाक़ा और है मेहवर कुछ और है
पत्थर समझ रहा है ज़माना तो क्या करूँ
मुट्ठी में मेरी जब कि मुनव्वर कुछ और है
तासीर-ए-ख़ाक आएगी अल्फ़ाज़ में मिरे
दिल में है और बात लबों पर कुछ और है
'आलम' मुझे भरोसा नहीं ज़ाइचों पे अब
इस में लिखा था और मुयस्सर कुछ और है
— Alam Khursheed















