पहले मुझ पर बहुत फ़िदा होना
उस की चाहत का फिर फ़ना होना
ये भी बख़िये उधेड़ देती है
उस को हल्का न ले हवा होना
ख़ुद को महरूम-ए-रौशनी रख कर
कितना मुश्किल है इक दिया होना
इस सुहूलत से ज़िंदगी काटी
मुझ को आया न पारसा होना
तू मिरी मुश्किलात क्या समझे
तुझ को आता है बस ख़ुदा होना
मेरी तरतीब से रही नालाँ
ज़ीस्त को आ गया ख़फ़ा होना
उस के जीवन में आ गया कोई
खा गया मुझ को दूसरा होना
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