"दीवानी बातें"
मेरे कमरे में अक्सर ही
ये यादें रक़्स करती है
कभी दोस्ताँ बुलाए गर
तो मैं घर से निकल आऊँ
मचाऊँ शोर बाहर आ
सुनाऊँ तुझ को हाल-ए-दिल
जो कहता मूँद ले आँखें
दिखाऊँ ख़्वाब फिर तुम को
कहीं सन्नाटे में बैठा है
तमाशा हँस के देखें हैं
न करना ज़ेहन की बातें
न समझे कुछ न जाने हैं
मेरे ख़यालों के ये बच्चे
सभी पागल दिवाने हैं
झपक ली पलकें उस पर गर
जी को कैसे सँभालेंगे
मेरे गालों पे लाली है
तेरे होंटो की ख़्वाहिश में
जो ये मेरा मुकद्दर है
गुमाँ है या हक़ीक़त है
मोहल्ला दिल का है वीराँ
तेरी पर याद महके हैं
इसी महकी सी स्याही से
लिखी दीवानी क़िस्मत है
मेरी आँखें बोझल हैं कुछ
बड़ी नाशाद पलकें हैं
मेरे माथे कि सिलवट में
तू क्या तक़दीर ढूँढ़े हैं
है इस का ख़्वाब इतना सा
तू सीने से आ लग जाए
मेरे काँधे से लग कर रो
मेरी आँखों में देखे फिर
जो ये ख़्वाबों के मंज़र हैं
समेटे दर्द आहों में
सँभाले ज़ख़्म माज़ी के
तेरी यादों के पैकर में
हैं तस्वीरें पुरानी कुछ
मेरा पागल सा दिल है इक
धड़क कर शोर करता है
घरों की खिड़की मानो जूँ
हवा से नाचें गाए हैं
किसी जंगल का कोई पेड़
जूँ बिजली चूम कर आए
मुसाफ़िर जो भटक जाए
नई इक राह को पाए
तू आँसू देख आँखों के
मचाए शोर पीड़ा में
ये बहते आँसू के दरिया
किसी साहिल पे बैठें हैं
तेरी महताब सूरत को
सँवारे अपने शाने पर
मैं भी पत्थर की मूरत बन
किनारे पर आ बैठा हूँ
तुझे देखूँ मैं छत पर से
तेरा ही अक्स दरिया में
इसी उम्मीद को बाँधे
मैं अपने घर की चौखट पर
जमाए आँख बैठा हूँ
दिवाना हूँ, दिवाना मैं
दिवाने जैसी बातें हैं
न जाने ज़ेहन में क्या क्या
दिवाने ख़्वाब बुनता हूँ
न सुन लेना मेरी नज़्
में
सभी बचकानी बातें हैं
बहुत उलझा सा लड़का हूँ
बहुत उलझी सी बातें हैं
ख़मोशी ज़ेहन की ओढ़े
मैं कुछ भी बकता रहता हूँ
ये बस अपना फ़साना है
ये बस अपनी हक़ीक़त है
न है तुझ से गिला कोई अब
न अब तुझ से शिकायत है
मैं पागल जैसा लड़का हूँ
यूँ ही मस्ती में रहता हूँ
जो भी मैं कहता हूँ तुम से
न इस पर ध्यान देना तुम
हाँ तो कुछ बात ऐसी है
मुझे तुम से मोहब्बत है















