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मेरी सारी कमाई लेने लगीं  - Dheerendra Singh Faiyaz

मेरी सारी कमाई लेने लगीं
साँसें मुझ से विदाई लेने लगीं

करवटों से अदा नहीं होती
नींदें जो मुँह दिखाई लेने लगीं

ख़्वाब का पैरहन उतारा तो
नंगी आँखें जमाई लेने लगीं

चाँद जैसे हो नींद की गोली
रातें क्या क्या दवाई लेने लगीं

मुझ को तूफ़ाँ में डूबना ही था
कश्तियाँ क्यूँ बुराई लेने लगीं

Dheerendra Singh Faiyaz
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