sabko hairaan kar jaaunga | सबको हैराँ कर जाऊँगा

  - Gourav Kumar

सबको हैराँ कर जाऊँगा
वक़्त से पहले मर जाऊँगा

पंछी फ़लक को निकल गए हैं
और मैं फिर दफ़्तर जाऊँगा

दरियाओं का दावा कब है
दो आँखें तो भर जाऊँगा

अगली बार मैं उससे मिलने
ख़ुद को भी ले कर जाऊँगा

ख़ूब हँसूँगा ऊपर ऊपर
अंदर अंदर डर जाऊँगा

इक दिन छुट्टी मिल जाएगी
इक दिन मैं भी घर जाऊँगा

आपको ज़हमत कुछ नइँ होगी
मैं चुपचाप बिखर जाऊँगा

  - Gourav Kumar

Dar Shayari

Our suggestion based on your choice

    मुझे अब तुम से डर लगने लगा है
    तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या
    Jaun Elia
    54 Likes
    तमाम शहर को तारीकियों से शिकवा है
    मगर चराग़ की बैअत से ख़ौफ़ आता है
    Aziz Nabeel
    18 Likes
    वही मंज़िलें वही दश्त ओ दर तिरे दिल-ज़दों के हैं राहबर
    वही आरज़ू वही जुस्तुजू वही राह-ए-पुर-ख़तर-ए-जुनूँ
    Noon Meem Rashid
    24 Likes
    नई सुब्ह पर नज़र है मगर आह ये भी डर है
    ये सहर भी रफ़्ता रफ़्ता कहीं शाम तक न पहुँचे
    Shakeel Badayuni
    30 Likes
    तेरे दर से जब उठ के जाना पड़ेगा
    ख़ुद अपना जनाज़ा उठाना पड़ेगा
    Khumar Barabankvi
    35 Likes
    बच्चों तुम्हीं बताओ कि मईया कहाँ गई
    रस्ते में छोड़कर ये सुरईया कहाँ गई

    इन रक्षकों के ख़ौफ़ से घर में छुपा हूँ मैं
    पूछेंगे ये ज़रूर कि गईया कहाँ गई
    Read Full
    Paplu Lucknawi
    23 Likes
    बात करो रूठे यारों से सन्नाटों से डर जाते हैं
    प्यार अकेला जी लेता है दोस्त अकेले मर जाते हैं
    Kumar Vishwas
    139 Likes
    वो कभी आग़ाज़ कर सकते नहीं
    ख़ौफ़ लगता है जिन्हें अंजाम से
    Siraj Faisal Khan
    22 Likes
    इस ख़ौफ़ में कि खुद न भटक जाएँ राह में
    भटके हुओं को राह दिखाता नहीं कोई
    Anwar Taban
    23 Likes
    मैं बार बार तुझे देखता हूॅं इस डर से
    कि पिछली बार का देखा हुआ ख़राब न हो
    Shaheen Abbas
    36 Likes

More by Gourav Kumar

As you were reading Shayari by Gourav Kumar

    तेरी क़ामयाबी, मेरी क़ामयाबी बराबर नहीं
    यहाँ तक पहुँचने में मेहनत है मेरी मुक़द्दर नहीं

    ख़ुदा ने यहाँ कैसे कैसों की झोली में क्या क्या दिया
    हमें मौत के वक़्त भी तेरी बाँहें मयस्सर नहीं

    उसे अपनी ग़लती का एहसास होता रहा उम्र भर
    मैं रुख़्सत हुआ था उसे चूम कर, लड़-झगड़ कर नहीं

    उजाला बनाना तो था पर अँधेरा मिटाना न था
    नया इश्क़ करना था लेकिन पुराना भुला कर नहीं

    ये वहशत के बढ़ने से समझे इसी रोज़ बिछड़े थे हम
    वगरना तो सहरा में कोई कैलेंडर-वैलेंडर नहीं

    इसी नाम-ओ-सूरत का इक शख़्स इस घर में रहता तो है
    मगर ढूँढ़ती हो जिसे तुम वो अरसे से घर पर नहीं
    Read Full
    Gourav Kumar

Similar Writers

our suggestion based on Gourav Kumar

Similar Moods

As you were reading Dar Shayari Shayari