हज़ार ग़म जिन्हें घेरें शराब क्यूँ न पिएं

बता ए साक़ी वो खान-खराब क्यूँ न पिएं

उजाड़ कर मुझे लिखा है उस ने मत पीना
लिखा है मैं ने भी उस को जवाब क्यूँ न पिएं

उन्हें नहीं है कोई हक के ग़म को भूल सकें
हो जिन के दिल में ग़म-ओ-इज़्तिराब क्यूँ न पिएं

हिसाब किस को हैं देना के कोई अपना नहीं
तो फिर जाना बिन तेरे बे-हिसाब क्यूँ न पिएं

किसी को ख़ून है पसंद और किसी को हैं पानी
हमारा तो है बस यहीं इंतिख़ाब क्यूँ न पिएं

भाग भाग के तेरी यादों के बयाबान में
थक चुका हूँ हमें भी सराब क्यूँ न पिएं

हमारे हाल से किस को ग़रज़ है दुनिया में
हज़ार बार पिएँगे हम, ज़नाब क्यूँ न पिएं

सुना हैं जाम है नशाद उन की मस्तानी आँखों में
तो आज उन को हटा कर नक़ाब क्यूँ न पिएं

— Harsh Jani

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