हूँ अगर मैं बुरा तो भला चाहिए

दूसरा अब कोई रहनुमा चाहिए

रोज़ किस को नया हादसा चाहिए
ज़िन्दगी का सफ़र ख़ुशनुमा चाहिए

सादगी रास आई न उस को मेरी
इश्क़ के ताजिरों मश्वरा चाहिए

हो कभी ख़ुदस भी रू-ब-रू आदमी
सामने इक अदद आइना चाहिए

कौन करता है सच्ची मुहब्बत यहाँ
जिस्म का बस हसीं ज़ाविया चाहिए

चुभ रही है कोई बात नश्तर सी पर
दिल को मरहम न कोई शिफ़ा चाहिए

बुन लूँ अपने ख़यालात से इक ग़ज़ल
बस 'प्रिया' अनछुआ क़ाफ़िया चाहिए

— Priya omar

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