न ज़िंदगी को हक़ीक़त न ख़्वाब लिखना है
वजूद-ए-ज़ीस्त को अपने सराब लिखना है
नज़र का अपनी मुझे इंतिख़ाब लिखना है
तुझी को चाँद तुझी को गुलाब लिखना है
रवाँ हो कारवाँ चाहे ज़वाल की जानिब
मुफ़क्किरों को मगर इंक़लाब लिखना है
ये हुस्न-ओ-इश्क़ वफ़ा-ओ-विसाल का मौसम
तुम्हीं बताओ कि किस को ख़राब लिखना है
फ़साद जुर्म अदावत ग़ुरूर अय्यारी
ज़रा सी उम्र में कितना हिसाब लिखना है
वो बात लिखना जो ज़ख़्म-ए-जिगर की मूजिब हो
अगर ख़तों का हमारे जवाब लिखना है
सुख़नवरों ने तो लिक्खा हबाब हस्ती को
हमें हयात को अपनी सराब लिखना है
— Khalid Nadeem Budauni















