ख़बर भी है मोहब्बत के परस्तारों पे क्या गुज़री
कोई है पोछने वाला कि बीमारों पे क्या गुज़री
अयादत से वो जब पलटें तो उन से पूछ ले कोई
वो कह देंगे बख़ूबी दिल के बीमारों पे क्या गुज़री
दिल-ए-यूसुफ़ से क्या पूछे ज़ुलेख़ा से ज़रा कोई
ख़रीदारों पे क्या गुज़री है बाज़ारों पे क्या गुज़री
समझ ही में नहीं आता कि है ये राज़-ए-उल्फ़त क्या
बचे क्यूँँकर ख़लीलुल्लाह अँगारों पे क्या गुज़री
न पूछो जल्वा-फ़रमा जब हुए वो नाज़-ओ-शोख़ी से
हुआ क्या हाल दीवानों का हुशयारों पे क्या गुज़री
तुम उठ कर क्या गए महफ़िल से इक महशर हुआ बरपा
तुम्हें मालूम ही क्या है परस्तारों पे क्या गुज़री
हुआ शागिर्द जब मैं हज़रत-ए-'महवी' का ऐ 'नाज़ी'
तुझे कुछ इल्म है सुन कर'' ख़बर यारों पे क्या गुज़री
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