garm-e-fariyaad rakha shakl-e-nihaali ne mujhe | गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे

  - Mirza Ghalib

गर्म-ए-फ़रियाद रखा शक्ल-ए-निहाली ने मुझे
तब अमाँ हिज्र में दी बर्द-ए-लयाली ने मुझे

निस्यह-ओ-नक़्द-ए-दो-आलम की हक़ीक़त मालूम
ले लिया मुझ से मिरी हिम्मत-ए-आली ने मुझे

कसरत-आराइ-ए-वहदत है परस्तारी-ए-वहम
कर दिया काफ़िर इन असनाम-ए-ख़याली ने मुझे

हवस-ए-गुल के तसव्वुर में भी खटका न रहा
अजब आराम दिया बे-पर-ओ-बाली ने मुझे

ज़िंदगी में भी रहा ज़ौक़-ए-फ़ना का मारा
नश्शा बख़्शा ग़ज़ब उस साग़र-ए-ख़ाली ने मुझे

बस-कि थी फ़स्ल-ए-ख़िज़ान-ए-चमानिस्तान-ए-सुख़न
रंग-ए-शोहरत न दिया ताज़ा-ख़याली ने मुझे

जल्वा-ए-ख़ुर से फ़ना होती है शबनम 'ग़ालिब'
खो दिया सतवत-ए-अस्मा-ए-जलाली ने मुझे

  - Mirza Ghalib

One sided love Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Mirza Ghalib

As you were reading Shayari by Mirza Ghalib

Similar Writers

our suggestion based on Mirza Ghalib

Similar Moods

As you were reading One sided love Shayari Shayari