गर तू मुझ को क़ुबूल नईं करता
फिर मैं भी ऐसी भूल नईं करता
पेड़ फलदार हो या सायादार
फ़ाइदा ये बबूल नईं करता
जिस्म उस का अजीब पत्थर है
कितना भी रगड़ो धूल नईं करता
काँटे चुभ जाते हैं अचानक से
ख़ुद मुलाक़ात फूल नईं करता
शा'इरी तो कमाल करता है
बातें बिल्कुल फ़ुज़ूल नईं करता
— Abuzar kamaal















