हसरत कभी कभी यहाँ अरमान बेच कर
हम जी रहे हैं अपनी ही पहचान बेच कर
ईमान की वो बातें सुनाते हैं बज़्म में
घर को चला रहे हैं जो ईमान बेच कर
ऐसे किसी की चाह में बेसुध हुए हैं हम
आँसू ख़रीद लाए हैं मुस्कान बेच कर
ऐसी शराब- नोशी की आदत है दोस्तों
घर बार पी गए कई रिंदान बेचकर
देखी जो चालबाज़ियाँ उल्फ़त के नाम पर
वो जा रहा है ख़्वाब को नादान बेचकर
हम को सुखनवरी से है शोहरत मिली फ़क़त
ख़र्चा चलाया हम ने है दीवान बेच कर
कूज़ा-गरों की बेबसी तो देखिए "मलक"
रोटी कमा रहें हैं वो भगवान बेच कर
— Ram Singar Malak















