हैवान की मंज़िल में बशर है कि नहीं है

इंसान को इंसान का डर है कि नहीं है

मेआ'र-ए-तजल्ली से तो वाक़िफ़ हैं निगाहें
जलवों को भी अंदाज़-ए-नज़र है कि नहीं है

फ़रज़ाना-ए-दौराँ भी है इस बात पे ख़ामोश
दीवाना सर-ए-राहगुज़र है कि नहीं है

जिस अज़्म से मंज़िल पे पहुँचते हैं मुसाफ़िर
वो अज़्म ब-ईं ज़ौक़-ए-सफ़र है कि नहीं है

बे-साख़्ता मंज़िल की तरफ़ भागने वालो
रफ़्तार-ए-ज़माना की ख़बर है कि नहीं है

रंगीनी-ए-आग़ाज़-ए-बहाराँ के असीरो
अंजाम-ए-बहाराँ पे नज़र है कि नहीं है

ना-क़दरी-ए-अफ़्कार के इस दौर-ए-फ़लक में
माइल बा-क़लम दस्त-ए-हुनर है कि नहीं है

अरबाब-ए-मोहब्बत पे जो ढाई है क़यामत
उस शाम-ए-शब-ए-ग़म की सहर है कि नहीं है

जिस दर से नसीम-ए-सहरी घर में हो दाख़िल
काशाना-ए-इम्काँ में वो दर है कि नहीं है

बातिल का गला काट दे जो हक़ की मदद से
ख़ून-ए-रग-ए-जाँ में वो असर है कि नहीं है

जिस दाग़ की ता'रीफ़ है दाग़-ए-ग़म-ए-जानाँ
वो दाग़ ब-मेआ'र-ए-जिगर है कि नहीं है

वो ज़ख़्म-ए-तमन्ना जो मुक़द्दर है 'सबा' का
उस ज़ख़्म पे हिकमत की नज़र है कि नहीं है

— Saba Naqvi

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