हर दर्द से बाँधे हुए रिश्ता कोई गुज़रे

क़ातिल कोई गुज़रे न मसीहा कोई गुज़रे

आईना ब-हर-राह-गुज़र बन गईं आँखें
इक उम्र से बैठे हैं कि तुम सा कोई गुज़रे

वो तिश्नगी-ए-जाँ है कि सहरा को तरस आए
अब होंटों को छूता हुआ दरिया कोई गुज़रे

उन से भी इलाज-ए-ग़म पिन्हाँ नहीं होगा
कह दें जो अगर उन का शनासा कोई गुज़रे

— Taj Bhopali

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Dariya Shayari

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