Parveen Umm-e-Mushtaq

Parveen Umm-e-Mushtaq

@parveen-umm-e-mushtaq

Parveen Umm-e-Mushtaq shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Parveen Umm-e-Mushtaq's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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मेरे लिए हज़ार करे एहतिमाम हिर्स
मैं वो हों मुझ पे डाल सकेगी न दाम हिर्स

है कुछ न कुछ हर आदमी को ला-कलाम हिर्स
लेकिन न इस क़दर कि बना ले ग़ुलाम हिर्स

ऐ ज़ुल्फ़ फैल फैल के रुख़्सार को न ढाँक
कर नीम-रोज़ की न शह-ए-मुल्क-ए-शाम हिर्स

वाइ'ज़ शराब-ओ-हूर की उल्फ़त में ग़र्क़ है
है सर से पाँव तक ये सितम-गर तमाम हिर्स

दिल छीन आशिक़ों के मगर होशियार रह
ऐसा न हो कि दिल को बना ले ग़ुलाम हिर्स

नाक़िस रहेंगे सारे तलव्वुन से कारोबार
करने न देगी तुझ को यहाँ कोई काम हिर्स

क़ब्ज़ा उठाएगी न दिल-ए-रोज़गार से
जब तक न ज़िंदगी का करे इख़्तिताम हिर्स

मुद्दत से इश्तियाक़ है बोस-ओ-कनार का
गर हुक्म हो शुरूअ' करे अपना काम हिर्स

'परवीं' लगी हुई है ख़ुदा से मुझे उमीद
दिल को मिरे बनाए न अपना ग़ुलाम हिर्स
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Parveen Umm-e-Mushtaq
मुतकब्बिर न हो ज़रदार बड़ी मुश्किल है
सब है आसान ये सरकार बड़ी मुश्किल है

कुफ़्र पर ख़ल्क़ है तय्यार बड़ी मुश्किल है
दीन बिल्कुल नहीं दरकार बड़ी मुश्किल है

कैसे टेढ़ा न चले मार बड़ी मुश्किल है
सीधी हो ज़ुल्फ़-ए-गिरह-दार बड़ी मुश्किल है

और होंगे वो कोई दाम में आने वाले
मुर्ग़-ए-दाना हो गिरफ़्तार बड़ी मुश्किल है

दिल है ग़मनाक तो कौनैन है मातम-ख़ाना
रोते हैं सब दर-ओ-दीवार बड़ी मुश्किल है

लोग कहते हैं कि दिल उस को न देना लेकिन
ब'अद इक़रार कै इंकार बड़ी मुश्किल है

शोला-ए-हुस्न-ए-बुताँ फूँक न दे आलम को
सुर्ख़ हैं फूल से रुख़्सार बड़ी मुश्किल है

इन दिनों हज़रत-ए-यूसुफ़ की वो ना-क़दरी है
नहीं बुढ़िया भी ख़रीदार बुरी मुश्किल है

मिल के रहना ही नहिं जानता याँ अब कोई
जान-ओ-दिल में भी है तकरार बड़ी मुश्किल है

न तरद्दुद का मज़ा है न सुकूँ की लज़्ज़त
कभी वादा कभी इंकार बड़ी मुश्किल है

तालिब-ए-सुल्ह हूँ मैं और नज़र तालिब-ए-जंग
रात दिन लड़ने पे तय्यार बड़ी मुश्किल है

हाए दुनिया में किसी में नहीं इतनी भी वफ़ा
जितना कुत्ता है वफ़ादार बड़ी मुश्किल है

आज तुम तेग़-ब-कफ़ हो तो सफ़ा-चट मैदाँ
कौन मरने पे हो तय्यार बड़ी मुश्किल है

जिंस-ए-दिल बेचने की हम को ज़रूरत 'परवीं'
और मादूम ख़रीदार बड़ी मुश्किल है
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Parveen Umm-e-Mushtaq
ज़बाँ है बे-ख़बर और बे-ज़बाँ दिल
कहे किस तरह से राज़-ए-निहाँ दिल

नहिं दुनिया को दिलदारी की आदत
सुनाए किस को अपनी दास्ताँ दिल

न पूछो बे-ठिकानों का ठिकाना
वहीं हम भी थे सरगर्दां जहाँ दिल

कटी है ज़िंदगी सब रंज खाते
कहे क्या उमर भर की दास्ताँ दिल

हमें भी थी कभी मिलने की लज़्ज़त
हमारा भी कभी था नौजवाँ दिल

न बाज़ आऊँगा मैं उल्फ़त से जब तक
उठाए जाएगा जौर-ए-बुताँ दिल

ग़म-ए-उल्फ़त ग़म-ए-दुनिया ग़म-ए-दीं
उठाए बार क्या क्या ना-तवाँ दिल

समझ में ख़ाक आए अक़्ल की बात
गए होश-ओ-ख़िरद आया जहाँ दिल

उन्हें रहम आए तो क्या आए 'परवीं'
वो ला-परवा है मेरा बे-ज़बाँ दिल
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Parveen Umm-e-Mushtaq
जाता रहा क़ल्ब से सारी ख़ुदाई का इश्क़
क़ाबिल-ए-तारीफ़ है तेरे फ़िदाई का इश्क़

कैसी मुसीबत है ये गुल को ख़मोशी का शौक़
बुलबुल-ए-बेताब को हर्ज़ा-सराई का इश्क़

पड़ गई बकने की लत वर्ना यहाँ तक न था
वाइज़-ए-ना-फ़हम को हर्ज़ा-सराई का इश्क़

करता हूँ जो बार बार बोसा-ए-रुख़ का सवाल
हुस्न के सदक़े से है मुझ को गदाई का इश्क़

तुम को ख़ुदा ने दिया सारी ख़ुदाई का हुस्न
मुझ को अता कर दिया सारी ख़ुदाई का इश्क़

आशिक़ ओ माशूक़ की हाए निभे किस तरह
उन को कुदूरत का शौक़ मुझ को सफ़ाई का इश्क़

पूछ ले 'परवीं' से या क़ैस से दरयाफ़्त कर
शहर में मशहूर है तेरे फ़िदाई का इश्क़
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Parveen Umm-e-Mushtaq
मुझ को क्या फ़ाएदा गर कोई रहा मेरे ब'अद
सारी मख़्लूक़ बला से हो फ़ना मेरे ब'अद

मर चुका मैं तो नहीं उस से मुझे कुछ हासिल
बरसे गर पानी की जा आब-ए-बक़ा मेरे ब'अद

चाहने वालों का करता है ज़माना मातम
मातमी रंग में है ज़ुल्फ़-ए-रसा मेरे ब'अद

रोएँगे मुझ को मिरे दोस्त सब आठ आठ आँसू
बरसेगी क़ब्र पे घनघोर घटा मेरे ब'अद

यूँ ही खिलती रहेंगी सेहन-ए-चमन में कलियाँ
यूँही चलती रहेगी बाद-ए-सबा मेरे ब'अद

जान देने को न उन पर कोई तय्यार हुआ
गोया जाँ-बाज़ ज़माने में न था मेरे ब'अद

हाथ से उन के टपकते नहीं मय के क़तरे
अश्क-ए-ख़ूँ रोता है ये रंग-ए-हिना मेरे ब'अद

हश्र तक कोई न रोकेगा सितम-गारों को
जो ख़ुदा पहले था वो ही है ख़ुदा मेरे ब'अद

जीते-जी देते थे जो गालियाँ मुझ को 'परवीं'
मग़फ़िरत के लिए करते हैं दुआ मेरे ब'अद
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Parveen Umm-e-Mushtaq
मुझ को दुनिया की तमन्ना है न दीं का लालच
हाए लालच है तो इक माह-जबीं का लालच

इश्क़-बाज़ी पे सुना मुझ को मलामत न करो
हैफ़ है जिस को न हो तुम से हसीं का लालच

हालत-ए-क़ल्ब सर-ए-बज़्म बताऊँ क्यूँकर
पर्दा-ए-दिल में है इक पर्दा-नशीं का लालच

जब यहीं तैश में गुज़रे तो वहाँ क्या उम्मीद
न रहा इस लिए हम को तो कहीं का लालच

बोरिया तख़्त-ए-सुलैमाँ से कहीं बेहतर है
हम ग़रीबों को नहीं ताज-ओ-नगीं का लालच

न मैं दुनिया का तलबगार न उक़्बा की हवस
आसमानों की तमन्ना न ज़मीं का लालच

दिल भी दो जान भी दो ज़र भी दो उस को 'परवीं'
बढ़ गया सब से मिरे माह-जबीं का लालच
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Parveen Umm-e-Mushtaq
खिलाया परतव-ए-रुख़्सार ने क्या गुल समुंदर में
हुबाब आ कर बने हर सम्त से बुलबुल समुंदर में

हमारे आह-ओ-नाला से ज़माना है तह-ओ-बाला
कभी है शोर सहरा में कभी है ग़ुल समुंदर में

किसी दिन मुझ को ले डूबेगा हिज्र-ए-यार का सदमा
चराग़-ए-हस्ती-ए-मौहूम होगा गुल समुंदर में

न छेड़ो मुझ को मैं ग़व्वास हूँ दरिया-ए-मअनी का
न ढूँडो मुझ को मुसतग़रक़ हूँ मैं बिल्कुल समुंदर में

तुम्हें दरिया-ए-ख़ूबी कह दिया ग़र्क़-ए-नदामत हूँ
कहाँ ये नाज़-ओ-ग़म्ज़ा आरिज़-ओ-काकुल समुंदर में

पड़ा था अक्स-ए-रू-ए-नाज़नीं अर्सा हुआ उस को
पर अब तक तैरता फिरता है शक्ल-ए-गुल समुंदर में

उठी मौज-ए-सबा जुम्बाँ से शाख़-ए-आशियाँ पैहम
चली जाती है गोया कश्ती-ए-बुलबुल समुंदर में

वो पाईं बाग़ में फिरते हैं मैं फ़िक्रों में डूबा हूँ
तमाशा है कि गुल गुलशन में है बुलबुल समुंदर में

अभी तो सैर को जाना लब-ए-दरिया वो सीखे हैं
अभी तो देखिए खिलते हैं क्या क्या गुल समुंदर में

ख़याल-ए-यार क्यूँ-कर आ गया तूफ़ान-ए-गिर्या में
ख़ुदा मालूम किस शय का बनाया पुल समुंदर में

कभी गिर्या का तूफ़ाँ है कभी हैरत का सन्नाटा
कभी बिल्कुल हूँ सहरा में कभी बिल्कुल समुंदर में

वो ज़ालिम आशिक़-आज़ारी की 'परवीं' मश्क़ करता है
दिखा कर बुलबुलों को डालता है गुल समुंदर में
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Parveen Umm-e-Mushtaq
मैं चुप कम रहा और रोया ज़ियादा
यक़ीनन ज़मीं कम है दरिया ज़ियादा

शब-ए-वस्ल मुर्ग़-ए-सहर याद रखना
ज़बाँ काट लूँगा जो रोया ज़ियादा

मैं नाज़ुक-मिज़ाजी से वाक़िफ़ हूँ क़ासिद
इसी वज्ह ख़त में न लिक्खा ज़ियादा

दो बोसे लिए उस ने दो गालियाँ दीं
न लेना ज़ियादा न देना ज़ियादा

वो सैर-ए-चमन के लिए आ रहा है
अकड़ना न शमशाद इतना ज़ियादा

वो उतना ही बनता है हिर्स-ए-मुजस्सम
ख़ुदा जिस को देता है जितना ज़ियादा

अमल पर मुझे ए'तिमाद अपने कम है
ख़ुदा के करम पर भरोसा ज़ियादा

जो आँखें तिरे ख़ाक-ए-दर से हैं रौशन
मिलाया है शायद ममीरा ज़ियादा

मुझे उल्फ़त-ए-ज़ुल्फ़ जब से है 'परवीं'
बताते हैं वो जोश-ए-सौदा ज़ियादा
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Parveen Umm-e-Mushtaq
बहुत दिन दर्स-ए-उल्फ़त में कटे हैं
मोहब्बत के सबक़ बरसों रटे हैं

जुनूँ में हो गया है अब ये दर्जा
कि है हालत रदी कपड़े फटे हैं

हरम से वापसी पर मेरी दावत
हुई मय-ख़ाने में मय-कश डटे हैं

बहुत पीर-ए-मुग़ाँ ज़ी-हौसला है
शराब-ए-नाब के साग़र लुटे हैं

रियाज़ ओ ज़ोहद के जितने थे धब्बे
वो सारे नक़्श-ए-बातिल अब मिटे हैं

तबर्रुक थे मिरी तौबा के टुकड़े
बजाए नक़्ल महफ़िल में बटे हैं

अलम के दर्द के हसरत के ग़म के
मज़े जितने हैं सारे चटपटे हैं

नहीं बे-वजह वाइज़ रोनी सूरत
ये हज़रत आज रिंदों में पिटे हैं

हुए जारूब-कश उस दर के 'परवीं'
कि सारे गर्द मिट्टी में अटे हैं
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Parveen Umm-e-Mushtaq
पोशाक न तू पहनियो ऐ सर्व-ए-रवाँ सुर्ख़
हो जाए न परतव से तिरे कौन-ओ-मकाँ सुर्ख़

याँ बादा-ए-अहमर के छलकते हैं जो साग़र
ऐ पीर-ए-मुग़ाँ देख कि है सारी दुकाँ सुर्ख़

पी बादा-ए-अहमर तो ये कहने लगा गुल-रू
मैं सुर्ख़ हूँ तुम सुर्ख़ ज़मीं सुर्ख़ ज़माँ सुर्ख़

क्या पान की सुर्ख़ी ने किया क़त्ल किसी को
शिद्दत से है क्यूँ आज तिरी तेग़-ए-ज़बाँ सुर्ख़

सीने में दिल-ए-ग़म-ज़दा ख़ूँ हो गया शायद
बे-वज्ह भी होते हैं कहीं अश्क-ए-रवाँ सुर्ख़

क्या भड़के है सीने में मिरे आतिश-ए-फ़ुर्क़त
जो आह के हम-राह निकलता है धुआँ सुर्ख़

ये क़त्ल-ए-ख़िज़ाँ पर हैं जवानान-ए-चमन शाद
हर सम्त गुल-ओ-लाला उड़ाते हैं निशाँ सुर्ख़

गर मेरी शहादत की बशारत नहीं 'परवीं'
फिर क्यूँ है ख़त-ए-शौक़ के उनवाँ ये निशाँ सुर्ख़
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Parveen Umm-e-Mushtaq
ख़ुदा के फ़ज़्ल से हम हक़ पे हैं बातिल से क्या निस्बत
हमें तुम से तअल्लुक़ है मह-ए-कामिल से क्या निस्बत

मह-ए-कनआँ को मेरे इस मह-ए-कामिल से क्या निस्बत
ज़ुलेख़ा के मुलव्विस दिल को मेरे दिल से क्या निस्बत

हमा का रम ज़ि-ख़ुद-कामी ब-बदनामी कशीद आख़िर
कभी मैं ने न सोचा राज़ को महफ़िल से क्या निस्बत

कहे जाता है जो वाइज़ सुने जाते हैं हम लेकिन
जो अहल-ए-दिल नहीं उस को हमारे दिल से क्या निस्बत

मुझे है सदमा-ए-हिज्राँ अदू को सैकड़ों ख़ुशियाँ
मिरे उजड़े हुए घर को भरी महफ़िल से क्या निस्बत

ख़ुदा ही फिर भरोसा है ख़ुदा है नाख़ुदा मेरा
वगर्ना मैं भँवर में हूँ मुझे साहिल से क्या निस्बत

फ़िराक़-ए-यार में मेरा दिल-ए-मुज़्तर न ठहरेगा
तुम्हीं सोचो सुकूँ को ताइर-ए-बिस्मिल से क्या निस्बत

कनीज़-ए-हज़रत-ए-मुश्किल-कुशा हूँ दिल से मैं 'परवीं'
तअल्लुक़ मुझ को आसानी से है मुश्किल से क्या निस्बत
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Parveen Umm-e-Mushtaq
नर्गिसीं आँख भी है अबरू-ए-ख़मदार के पास
दूसरी और भी तलवार है तलवार के पास

दुश्मनों का मिरी क़िस्मत से है क़ाबू मुझ पर
यार के पास है दिल यार है अग़्यार के पास

याद रखना जो हुई वादा-ख़िलाफ़ी उन की
बिस्तरा आन जमेगा तिरी दीवार के पास

क़ैदी-ए-ज़ुल्फ़ की क़िस्मत में है रुख़्सार की सैर
शुक्र है बाग़ भी है मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार के पास

चेहरा भी बर्क़ भी दिल लेने में गेसू भी बला
एक सा मोजज़ा है काफ़िर ओ दीं-दार के पास

ग़ैर बे-जुर्म हैं और मैं हूँ वफ़ा का मुजरिम
कौन आता भला मुझ से गुनहगार के पास

क़ब्र में सोएँगे आराम से अब ब'अद-ए-फ़ना
आएगा ख़्वाब-ए-अदम दीदा-ए-बेदार के पास

उस की क्या वज्ह मिरे होते वहाँ क्यूँ न रहें
क्यूँ रहे ज़ुल्फ़-ए-सियह आप के रुख़्सार के पास

होशियारी से हो 'परवीं' चमन-ए-हुस्न की सैर
दाम और दाना हैं दोनों रुख़-ए-दिलदार के पास
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Parveen Umm-e-Mushtaq
करेंगे ज़ुल्म दुनिया पर ये बुत और आसमाँ कब तक
रहेगा पीर ये कब तक रहोगे तुम जवाँ कब तक

ख़ुदावंदा इन्हें किस दिन शुऊर आएगा दुनिया का
रहेंगी बे-पढ़ी-लिक्खी हमारी लड़कियाँ कब तक

फिरेगा और कितने दिन ख़याली पार घोड़े पर
उड़ेगा शेर-गोई में न इंजन का धुआँ कब तक

इनान-ए-हुक्मरानी देखिए किस दिन ख़ुदा लेगा
रहेंगे क़िस्मतों पर हुक्मराँ ये आसमाँ कब तक

दिए जाएँगे कब तक शैख़-साहिब कुफ़्र के फ़तवे
रहेंगी उन के संदूक़चा में दीं की कुंजियाँ कब तक

चली जाएगी इक ही रुख़ हवा ताकि ज़माने की
न पूरा होगा तेरा दौर ये ऐ आसमाँ कब तक

तहम्मुल ख़त्म होते ही बड़ी बद-नामियाँ होंगी
तुम्हारे ख़ौफ़ से 'परवीं' न खोलेगी ज़बाँ कब तक
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Parveen Umm-e-Mushtaq
जिस तरह दो-जहाँ में ख़ुदा का नहीं शरीक
तेरे जमाल में नहीं कोई हसीं शरीक

मैं भी तिरा फ़िदाई हूँ मुझ पे भी रहम खा
जब तक है इस गुमान में कुछ कुछ यक़ीं शरीक

उस के सितम ही कम हैं जो औरों का नाम लूँ
है आसमाँ शरीक न इस में ज़मीं शरीक

रोज़-ए-जज़ा उम्मीद है सब को सज़ा मिले
इक़दाम-ए-क़त्ल में हैं मिरे सब हसीं शरीक

ऐ बद्र तेरा दावा-ए-यकताई सब ग़लत
जुमला सिफ़ात में है तिरे वो जबीं शरीक

सच पूछिए तो जान-ए-जहाँ मेरे क़त्ल में
तिरछी नज़र के साथ ही चीन-ए-जबीं शरीक

वाइज़ तू बाग़-ए-हुस्न की इक बार सैर कर
मुमकिन है दिलकशी में हो ख़ुल्द-ए-बरीं शरीक

क्या वज्ह तेरे ज़ुल्म-ओ-सितम में मज़ा नहीं
ऐ दौर-ए-चर्ख़ आज वो शायद नहीं शरीक

भेजा पयाम-ए-जल्सा तो अंदाज़ से कहा
अर्सा हुआ कि हम नहीं होते कहीं शरीक

'परवीं' ग़लत है उन को समझना जुदा जुदा
हैं जिस्म-ओ-जाँ की तरह से दुनिया-ओ-दीं शरीक
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Parveen Umm-e-Mushtaq
मैं चुप रहूँ तो गोया रंज-ओ-ग़म-ए-निहाँ हूँ
बोलूँ तो सर से पा तक हसरत की दास्ताँ हूँ

मसरूर हो तू मुझ से मैं तुझ से शादमाँ हूँ
तू मेरा मेहमाँ हो मैं तेरा मेज़बाँ हूँ

कहती है उन की मस्ती होश आए तो मैं पूछूँ
ऐ बे-ख़ुदी बता दे इस वक़्त मैं कहाँ हूँ

इरशाद पर नज़र है ख़ामोश हूँ कि गोया
चाहो तो बे-ज़बाँ हूँ चाहो तो बा-ज़बाँ हूँ

जाँ घुल चुकी है ग़म में इक तन है वो भी मोहमल
मअनी नहीं हैं बिल्कुल मुझ में अगर बयाँ हूँ

मैं हूँ जुनूँ के हाथों मख़्लूक़ का तमाशा
ना-मेहरबाँ हूँ ख़ुद पर दुनिया पे मेहरबाँ हूँ

अल्लाह-रे उस की चौखट है बोसा-गाह-ए-आलम
कहता है संग-ए-असवद मैं संग-ए-आस्ताँ हूँ

कहता है मेरा नाला लब तक मैं आते आते
सौ जा थमा हूँ रह में इस दर्जा ना-तवाँ हूँ

नफ़रत हो जिस को मुझ से मिलने का उस से हासिल
नज़रों में क्यूँ सुबुक हूँ ख़ातिर पे क्यूँ गिराँ हूँ

मुद्दत में तुम मिले हो क्यूँ ज़िक्र-ए-ग़ैर आए
मैं अपने साए से भी ख़ल्वत में बद-गुमाँ हूँ

चुप रह गया पयामी लेकिन ये ख़ैर गुज़री
ख़त ने कहा कि सुनिए 'परवीं' की मैं ज़बाँ हूँ
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Parveen Umm-e-Mushtaq
ग़रीब आदमी को ठाट पादशाही का
ये पेश-ख़ेमा है ज़ालिम तिरी तबाही का

ख़दंग-ए-आह को रोके रहा हूँ फ़ुर्क़त में
ख़याल है मुझे अफ़्लाक की तबाही का

उमीद कैसे हो महशर में सुर्ख़-रूई की
हमेशा काम किया हो जो रू-सियाही का

सलाम तक नहीं लेते कलाम तो कैसा
फ़क़ीरी में भी तबख़्तुर है बादशाही का

शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ज़िम्मा नहीं दिल-ए-नादाँ
लड़े हज़ार में ये काम है सिपाही का

ख़िज़ाब करते हैं दुनिया से जब गए गुज़रे
शुगून करते हैं पीरी में रू-सियाही का

न आसमाँ की इनायत न मेहरबाँ वो शोख़
न पूछो हाल ग़रीबों की बे-पनाही का

सफ़ेद बालों पे किस वास्ते ख़िज़ाब लगाएँ
गया ज़माना जवानी में रू-सियाही का

ख़ताएँ हो गईं मादूम हज से ऐ 'परवीं'
गवाह ख़ुद है ख़ुदा मेरी बे-गुनाही का
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Parveen Umm-e-Mushtaq
दिल पुकारा फँस के कू-ए-यार में
रोक रक्खा है मुझे गुलज़ार में

फ़र्क़ क्या मक़्तल में और गुलज़ार में
ढाल में हैं फूल फल तलवार में

लुत्फ़ दुनिया में नहीं तकरार में
लेकिन उन के बोसा-ए-रुख़्सार में

था जो शब को साया-ए-रुख़्सार में
ताज़गी कितनी है बासी हार में

फ़र्त-ए-मायूसी ने मुर्दा हसरतें
दफ़्न कर दी हैं दिल-ए-बीमार में

शाद हो जाती है दुनिया ऐ रूपे
क्या करामत है तिरी झंकार में

आतिश-ए-उल्फ़त की धड़कन बढ़ गई
गिर पड़ा दिल शोला-ए-रुख़्सार में

आह के क़ब्ज़े में है तासीर या
तेग़ है दस्त-ए-अलम-बरदार में

नश्तर-ए-मिज़्गाँ की तेज़ी के सबब
एक काँटा है दिल-ए-पुर-ख़ार में

आब-ए-पैकाँ पास है लेकिन नसीब
फिर भी ख़ुश्की है लब-ए-सोफ़ार में

ख़ैर हो 'परवीं' दिल-ए-मुज़्तर मिरा
ले चला फिर कूचा-ए-दिलदार में
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Parveen Umm-e-Mushtaq
देखो तो ज़रा ग़ज़ब ख़ुदा का
ज़ालिम ने मुझी को पहले ताका

अल्लाह अता करे क़नाअ'त
नुस्ख़ा वाजिब-उल-अदा का

दिल देता हूँ मुफ़्त और कोई
पुरसाँ नहीं नक़्द-ए-नारवा का

वाँ मुझ पे जफ़ाएँ हो रही हैं
याँ विर्द है लफ़्ज़-ए-मर्हबा का

आना हो तो नज़्अ' में हूँ आओ
ये वक़्त नहीं है इल्तवा का

अब आए हो बन के तुम मसीहा
जब वक़्त गुज़र चुका दवा का

दामन में रवाँ हैं अश्क-ए-गुलगूँ
महज़र है ये ख़ून-ए-मुद्दआ का

लाया तो है उन को जज़्ब-ए-उल्फ़त
आया तो है ध्यान बे-नवा का

मैं हो ही चुका था ज़िंदा दरगोर
तुम आ गए शुक्र है ख़ुदा का

दुनिया से गुज़र चुके तो 'परवीं'
झगड़ा न रहा फ़ना बक़ा का
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Parveen Umm-e-Mushtaq
फैला हुआ है बाग़ में हर सम्त नूर-व-सुब्ह
बुलबुल के चहचहों से है ज़ाहिर सुरूर-ए-सुब्ह

बैठे हो तुम जो चेहरे से उल्टे नक़ाब को
फैला हुआ है चार तरफ़ शब को नूर-व-सुब्ह

बद-क़िस्मतों को गर हो मयस्सर शब-ए-विसाल
सूरज ग़ुरूब होते ही ज़ाहिर हो नूर-व-सुब्ह

पौ फटते ही रियाज़-ए-जहाँ ख़ुल्द बन गया
ग़िल्मान-ए-महर साथ लिए आई हूर-ए-सुब्ह

मुर्ग़-ए-सहर अदू न मोअज़्ज़िन की कुछ ख़ता
'परवीं' शब-ए-विसाल में सब है फ़ुतूर-ए-सुब्ह
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Parveen Umm-e-Mushtaq
ख़ाक कर डालें अभी चाहें तो मय-ख़ाने को हम
एक साग़र को भरो तुम एक पैमाने को हम

मुझ से हम-आग़ोश हो कर यूँ कहा और सच कहा
होशियार इस तरह कर देते हैं दीवाने को हम

नज़'अ में आए हैं सद अफ़सोस जीते-जी न आए
वो हैं आने को तो अब तय्यार हैं जाने को हम

बे-नतीजा उन पे मरना याद आता है हमें
शम्अ पर जब देखते हैं मरते परवाने को हम

कोहकन और क़ैस की क़ब्रों से आती है सदा
क्या मुकम्मल कर गए उल्फ़त के अफ़्साने को हम

एक पत्ता भी नहीं हिलता ब-जुज़ हुक्म-ए-ख़ुदा
किस तरह आबाद कर लें अपने वीराने को हम

एक दिन ये है कि हैं इक शम्अ-रू पर ख़ुद निसार
एक दिन वो था बुरा कहते थे परवाने को हम

अबरुओं ने सच कहा उस के इशारे की है देर
देखते बिल्कुल नहीं फिर अपने बेगाने को हम

जान जाए या रहे उस को सुनाएँगे ज़रूर
क़ैस के पर्दा में 'परवीं' अपने अफ़्साने को हम
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Parveen Umm-e-Mushtaq

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