ज़ीस्त की अब कमान यूँ ख़म हो
इश्क़ तो हो मुझे मगर कम हो
घाव को फिर से क्यूँ न मैं छेड़ूँ
चाहता हूँ कि आँख फिर नम हो
अब नहीं चाहिए शिफ़ा मुझको
दर्द अब हो मुझे तो पैहम हो
मारता हूँ मैं ख़ुद को ही चाबुक
अब समझ आ गया मोहर्रम हो
रो सकूँ मैं लगा के सीने से
ऐसा कोई तो यार महरम हो
लेने आएगी मौत जब मुझको
मेरे पहलू में आब-ए-ज़मज़म हो
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