सुख़न वर सौ जतन कर के लब ओ रुख़सार तक पहुँचे

कहाँ हिम्मत किसी में जो तिरे मेआ'र तक पहुँचे

ग़ज़ल क्या चाहती है और फ़न के क्या तक़ाज़े हैं
जिन्हें ये फ़िक्र लाहक़ थी वही अफ़्कार तक पहुँचे

मैं वैसे तो बहुत ख़ुद्दार हूँ लेकिन ये ख़्वाहिश है
कि मेरे ग़म का हर क़िस्सा मिरे दिलदार तक पहुँचे

सुना है इश्क़ में मंज़िल फ़ना हो कर ही मिलती है
सो हम तेरी ही चाहत में सलीब-ओ-दार तक पहुँचे

हमें था इश्क़ ख़ालिक़ से उन्हें था इश्क़ आशिक़ से
वो अपने यार तक पहुँचे हम अपने यार तक पहुँचे

मुहब्बत कैसा रिश्ता है समझ में ये नहीं आता
न दिल इनकार तक पहुँचे न दिल इक़रार तक पहुँचे

सफ़र में हम सफ़र का साथ पाया तो लगा ऐसा
झुलसती धूप में हम साया-ए-दीवार तक पहुँचे

ये हलमिन की सदा है और नुसरत का तक़ाज़ा है
ज़रूरी है कि अपना हाथ अब तलवार तक पहुँचे

उठा है एक तूफ़ाँ आज फिर दरिया ए हस्ती में
सफ़ीना कैसे अब इस पार से उस पार तक पहुँचे

क़लंदर फ़ैज़ पाते थे हमेशा फ़ाक़ा-मस्ती से
जो दुनिया दार थे वो दिरहम-ओ-दिनार तक पहुँचे

— Dard Faiz Khan

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