साथ अब ज़िंदगी ये बसा लो न तुम
ज़िंदगी मुझ को अपनी बना लो न तुम
याद कब से तुम्हारी मुझे आ रही
आके मुझ को गले से लगा लो न तुम
टूटने वाला है धागा ये प्रीत का
आके रिश्ता हमारा बचा लो न तुम
ज़िंदगी ये मिरी दाँव पर है लगी
सोच कर कोई अब फ़ैसला लो न तुम
मैं नहीं चाहता खोना तुम को कभी
मुझ को बाँहों में अपनी छुपा लो न तुम
आइने में खड़ा शख़्स कहता है अब
एक तरफा ही रिश्ता निभा लो न तुम
देख कर ये लड़ाई हमारी 'अमन'
कहते हैं लोग सब से मज़ा लो न तुम
— Avijit Aman















