ख़्वाब का इज़्न था ता'बीर-ए-इजाज़त थी मुझे

वो समय ऐसा था मरने में सुहूलत थी मुझे

एक बे-बर्ग शजर धुँद में लिपटा हुआ था
शाख़ पर बैठी दु'आओं की ज़रूरत थी मुझे

रात मस्जिद में अँधेरा तो बहुत था लेकिन
याद भूली सी कोई राह-ए-इबादत थी मुझे

ऐ मिरी जाँ वही 'ग़ालिब' की सी हालत थी मिरी
तेरे जाने की घड़ी थी कि क़यामत थी मुझे

दास्ताँ-गो ने दिखा दी थी मुझे शहज़ादी
और फिर ख़्वाब में चलने की भी आदत थी मुझे

— Ahmad Ata

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