छोड़ो अब उस चराग़ का चर्चा बहुत हुआ

अपना तो सब के हाथों ख़सारा बहुत हुआ

क्या बे-सबब किसी से कहीं ऊबते हैं लोग
बावर करो कि ज़िक्र तुम्हारा बहुत हुआ

बैठे रहे कि तेज़ बहुत थी हवा-ए-शौक़
दश्त-ए-हवस का गरचे इरादा बहुत हुआ

आख़िर को उठ गए थे जो इक बात कह के हम
सुनते हैं फिर उसी का इआदा बहुत हुआ

मिलने दिया न उस से हमें जिस ख़याल ने
सोचा तो इस ख़याल से सदमा बहुत हुआ

अच्छा तो अब सफ़र हो किसी और सम्त में
ये रोज़-ओ-शब का जागना सोना बहुत हुआ

— Ahmad Mahfuz

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Yaad Shayari

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