नज़्म:- रील

जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ,
तो पाता हूँ, कुछ मंज़र हैं जो मैं ने खो दिए हैं,
वो लोग जो मेरी ज़ात से मंसूब थे,
मेरी ज़ात से आगे निकल गए हैं,
वो लोग जिन को मैं ने लिखना सिखाया,
वो अपनी कहानी से मुझ को मिटा चुके हैं,
जिन के कासे भरे मैं ने दु'आओं से,
वो नवाज़े गए तो मुझ ही को ख़ैरात करने लगे,
हर वो शख़्स जिस को पलकों पर बैठाया मैं ने,
मिज़्गाँ पे आते ही मेरी आँखें बंद कर दी,

जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ,
तो पाता हूँ, वो एक शख़्स,
जिस से मैं ने बेइंतिहा मोहब्बत की,
उसे लोग किसी और के तवस्सुत से जानते हैं,
वो एक शाम जो मैं किसी पर उधार छोड़ आया था,
उस का सूद अब कोई और खा रहा है,
वो एक परीज़ाद जिस के होने पर नाज़ था मुझ को,
वो दो आँखें जिन
में ये ज़ीस्त बसर करनी थी,
वो दोनों मेरे तमाम सानेहा की नाज़रीन थी,
वो जिस के माथे को चूम कर मैं लौट आया था,
जिस की ज़ुल्फ़ों के पेचो-ख़म में
अपने यादें छोड़ आया हूँ,
अपने कपड़ों में जिस की महक,
जिस के होंटों की निशानी ले आया हूँ,
वो एक शख़्स, जिसे सिर्फ़ मेरा होना था,
मैं उसे न जाने किन उलझनों में छोड़ आया,

जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ,
तो पाता हूँ, कुछ साल पहले तक,
कुछ दोस्त थे मेरे, मेहकशों की टोली थी,
अकड़ कर चलते थे,
एक दूसरों के ग़म के साथी थे,
वो गुलदस्ता अब बिखर चुका है,
हर एक फूल मुरझा गए हैं,
वो हँसते गाते चेहरे गूँगे पड़े हैं,
वो तार जिन
में कभी सरगम थी,
तार तार हो कर बिखर चुके हैं,
वो आँखें जिन
में आने वाले मंज़र थे,
माज़ी के पन्नों तले दफ़न पड़े हैं,

जब मैं अपनी ज़िंदगी की रील को पलट कर देखता हूँ,
तो पाता हूँ कि हर जगह बस मैं ही मैं था,
इन महफ़िलों में था,
वीरानियों का साथी मैं था,
मैं ने ही सहराओं में गीत गाए हैं,
मैं ही नहाएा पत्थरों की बारिश में,
चाँद की तन्हाई का साथी,
सितारों को महफ़िल में रौशन,
सूरज की आग को हवा देता,
बर्फीले पहाड़ों को था
में हुए,
इन समंदरों को अपनी जगह रोके हुए,
इन नदी दरियाओं को मिलता हुआ,
सब को मंज़िल पर पहुँचता हुआ,
तन्हाइयाँ सबकी मिटाता हुआ,
मैं ही तो था, हर जगह बस मैं ही तो था,

मैं ने ही चीरा नील को भी,
मैं ही ज़िंदा था मछली में,
आब-ए-जमजम मेरा मुक़द्दर,
मैं ही लटका सूली पर,
कर्बला में मैं ही कटा,
मैं ने ही चाँद को काटा,
मैं ही था सब से पहले,
जन्नत थी मेरी जागीर,
कुछ नहीं बचा, कुछ नहीं रहा,
ये फ़िल्म भी अब ख़त्म हो रही है,
रील भी पूरी हो चुकी है, साँस भी अब रुक गई है,
मगर मैं फिर भी पलट पलट कर देख रहा हूँ अपनी ज़िंदगी की रील को,
और मैं पाता हूँ कि मैं ने बहुत कुछ खो दिया है,
मैं ने सब कुछ खो दिया है।

— Aves Sayyad

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