0

चले भी आओ कि दिल को ज़रा क़रार नहीं  - Dr. Ahmar Rifai

चले भी आओ कि दिल को ज़रा क़रार नहीं
ख़ुदा गवाह कि अब ताब-ए-इंतिज़ार नहीं

नहीं कि दिल पे मोहब्बत में इख़्तियार नहीं
नहीं नहीं मुझे फ़िक्र-ए-मआल-ए-कार नहीं

ब-क़द्र-ए-जोश-ए-जुनूँ चाक हो गरेबाँ क्या
बहार भी तो ब-अंदाज़-ए-बहार नहीं

अजीब हाल है इस दौर-ए-ज़र-गरी में कहीं
सिवाए दिल कोई दर्द-आश्ना-ए-यार नहीं

अब और इस के सिवा एहतियात-ए-इश्क़ हो क्या
कि तेरा ग़म मिरी सूरत से आश्कार नहीं

न जाने कौन सा आलम है ये मोहब्बत का
हमें ख़याल है अपना ख़याल-ए-यार नहीं

निगाह-ए-यार ने पहुँचा दिया कहाँ 'अख़्तर'
कि हम को अपनी निगाहों का ए'तिबार नहीं

Dr. Ahmar Rifai
0

Share this on social media

Miscellaneous Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Dr. Ahmar Rifai

As you were reading Shayari by Dr. Ahmar Rifai

Similar Writers

our suggestion based on Dr. Ahmar Rifai

Similar Moods

As you were reading Miscellaneous Shayari