चाँद से बढ़ के है इक झलक आप की

उस पे ये उठती गिरती पलक आप की

हो गया हर नज़ारा हसीं वो सनम
जब भी बनती हैं बाँहें फ़लक आप की

कोई कैसे भला होश में अब रहे
है नज़र जैसे मय की छलक आप की

पास होने से है शाद दिल ये मेरा
है बड़ी गुफ़्तगू में ढलक आप की

हो नवाज़िश तलबगार हूँ इश्क़ का
मुझ पे होगी नज़र कब तलक आप की

— Priya omar

More by Priya omar

Other ghazal from the same pen

See all from Priya omar →

Mehboob Shayari

Shers of mehboob.

All Mehboob Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling