मैं कलम से काग़ज़ पर अपना दिल बनाऊँगा
और फिर तेरा दिल भी मुत्तसिल बनाऊँगा
बैठ कर के साहिल की तपती रेत पर यारों
उँगलियों से इक दरिया मुश्तइल बनाऊँगा
इश्क़ अपने हिस्से का बाँट कर किसी और को
मैं तेरी मोहब्बत को मुन्तक़िल बनाऊँगा
रात दिन तेरी ज़ुल्फ़ें जो हवा में उड़ती हैं
इनको अपने हाथों से मुस्तक़िल बनाऊँगा
हँसते हँसते लोगों को मैं पुरानी ग़ज़लों से
हर किसी को अबकी मैं मुज़्महिल बनाऊँगा
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Rachit Sonkar
our suggestion based on Rachit Sonkar
As you were reading Neend Shayari Shayari