Safar
Safar
Ghazal

मैं दरिया-ओ-शीशा नहीं देखता

मैं कुछ भी अनोखा नहीं देखता

तेरा हुस्न किस काम का है बता
मैं कह दूँ अगर, जा नहीं देखता

तसल्ली से तब्दील कर लो लिबास
चलो अच्छा, बाबा नहीं देखता

मुझे रब ने बख़्शा है ऐसा तिलिस्म
मुझे कोई अंधा नहीं देखता

मैं ख़ुद तोड़ देता हूँ रिश्तों की डोर
मैं मौसम बदलता नहीं देखता

ये कह कर मेरा चारा-गर चल दिया
मदारी तमाशा नहीं देखता

— Safar

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