दोस्ती छोड़ तुझ सेे लिया कुछ नहीं
और वो तो छोड़ तू ने दिया कुछ नहीं
तेरी आँखों से पीनी थी मुझ को कभी
फिर तेरे बा'द मैं ने पिया कुछ नहीं
मुझ को मैं इस लिए भी नहीं हूँ पसंद
रोज़ चाहा तुझे पर किया कुछ नहीं
ज़ख़्म छू कर कुरेदा सभी ने मेरा
हाँ छुआ सबने लेकिन सिया कुछ नहीं
सर झुका कर पा लेते तुम्हें हम मगर
सर झुका कर तो हम ने लिया कुछ नहीं
वो सलीक़ा सिखाती है जीने का यार
हम ने तो ज़िंदगी में जिया कुछ नहीं
— Shantanu Bhardwaj















