इश्क़ की बात याद आती है
ज़िंदगी कैसे बीत जाती है
उस गली से गुज़र के देखा है
नज़रें वो आज भी झुकाती है
क्या अजब खेल है मोहब्बत भी
बे-वफ़ाओं से दिल लगाती है
पेड़ दरिया में सूख जाते हैं
सहरा में प्यास बुझती जाती है
— Amanpreet singh
ज़िंदगी कैसे बीत जाती है
उस गली से गुज़र के देखा है
नज़रें वो आज भी झुकाती है
क्या अजब खेल है मोहब्बत भी
बे-वफ़ाओं से दिल लगाती है
पेड़ दरिया में सूख जाते हैं
सहरा में प्यास बुझती जाती है
Other ghazal from the same pen
Shers of samundar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling