दिल के दर पे कोई भी पहरा नहीं है
इस लिए शायद कोई ठहरा नहीं है
चीख़ चिल्ला के, मना के देखता पर
यार वो बे-रहम है, बहरा नहीं है
मौत आती क्यूँ नहीं इस हिज्र में अब
हिज्र का वो जख़्म अब गहरा नहीं है
बस गुलामी ही मिली है दिल-लगी में
दिल तिरंगे सा कभी फहरा नहीं है
सीखता हूँ मैं हवा से और नदी से
इस लिए 'रंजन' कभी ठहरा नहीं है
— Ranjan Kumar Barnwal















