"इंतिज़ार"
कब तक ये बार हिज्र का दिल पर उठाऊँ मैं
कब तक ग़म-ए-फ़िराक़ का मातम मनाऊँ मैं
कब तक जहाँ से दर्द-ए-मोहब्बत छुपाऊँ मैं
कब तक लबों पे झूठा तबस्सुम सजाऊँ मैं
कब तक बता दे और ये रंज-ओ-अलम सहूँ
कब तक यूँ तेरी याद में गिर्या-कुनाँ रहूँ
कब तक उदासियों में बसर ज़िंदगी करूँ
कब तक ये दिल जला के बता रौशनी करूँ
कब तक जहाँ से दूर मैं यूँ तीरगी करूँ
कब तक तिरे फ़िराक़ में मैं शा'इरी करूँ
कब तक रखूँ सवाल दिल-ए-बे क़रार में
कब तक बिछाऊँ पलकें तिरे इंतिज़ार में
कब तक ये तेरी याद गले से लगाऊँ मैं
कब तक उदास शामों में आँसू बहाऊँ मैं
कब तक ये तेरा चेहरा लहू से बनाऊँ मैं
कब तक यूँ नाम लिख के तिरा और मिटाऊँ मैं
कब तक यूँ तिश्ना तड़पूँ बता दीद-ए-आब को
कब तक पढ़ूँ मैं और जुदाई के बाब को
कब तक करेगा इश्क़ में रुसवा मुझे जहाँ
कब तक ग़म-ए-जुदाई में निकलेगी मेरी जाँ
कब तक जहाँ में भटकूँगा आख़िर यहाँ वहाँ
कब तक मिलेगी आशिक़-ए-बीमार को अमाँ
कब तक ये ऐसे ठोकरे दर दर की खाएगा
कब तक सुकून ये दिल-ए-बीमार पाएगा
कब तक यूँ मुब्तिला मैं रहूँगा सवाल में
कब तक जकड़ के रक्खेगा यादों के जाल में
कब तक ख़याल बन के रहेगा ख़याल में
कब तक हयात गुज़रेगी मेरी ज़वाल में
कब तक भला ये रंज-ओ-अलम मैं उठाऊँगा
कब तक बता दे और ये ग़म मैं उठाऊँगा
कब तक रह-ए-फ़िराक़ पे करता रहूँ सफ़र
कब तक मैं सुबह-ओ-शाम फिरूँ और दर-ब-दर
कब तक न जाने लाएगी मेरी दुआ असर
कब तक ग़म-ए-हयात मिरी होगी मुख़्तसर
कब तक दिल-ए-शजर में रहेगी ये बेकली
कब तक बता तू आएगा ऐ बारहवें अली















