एक हर्फ़-ए-मुद्दआ' था दास्ताँ कैसे हुआ
रेग का ये सिलसिला आब-ए-रवाँ कैसे हुआ
वो अभी हमराह था इस ज़िंदगी के दश्त में
उम्र भर का साथ पल में राएगाँ कैसे हुआ
आशनाई में वो चेहरा सूरत-ए-ख़ुर्शीद था
अजनबी हो कर वही चेहरा धुआँ कैसे हुआ
दिल तो पहले ही लहू था दशना-ए-अय्याम से
तुझ से ये वार-ए-सितम ऐ मेहरबाँ कैसे हुआ
हो गई शायद ख़बर उस को फ़ज़ा में ज़हर की
ताज़ा-दम ताइर वगर्ना नीम-जाँ कैसे हुआ
— Ahmad Azeem















