कोई शिकवा नहीं ये कहने में
ज़िन्दगी कट गई है रस्ते में
बात करनी है साए से अपने
साथ दे दो इसे पकड़ने में
इक महीने के इश्क़ से हम को
बरसों लग जाते हैं है उभरने में
काश ये दिल भी लकड़ी का होता
ठंड मिट जाती इस के जलने में
क़ब्र से छोटी चारपाई है
रात कटती है बस सिमटने में
सिर्फ़ ठोकर से कुछ नहीं होता
हाथ दरकार है सँभलने में
नस्ल-ए-नौ का हूँ पर बुज़ुर्गों से
दो मिनट लगते घुलने मिलने में
हुस्न से इश्क़ रौंदने वाली
देर लगती है हुस्न ढलने में?
— Akhil Saxena















