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तुम अपने आप को बदलो तो दूसरा बदले  - Dilnawaz Siddiqi

तुम अपने आप को बदलो तो दूसरा बदले
तुम्हें ये शौक़ कि किरदार आईना बदले

दिल-ओ-दिमाग़ की राहें हैं मुख़्तलिफ़ कब से
तुम्हारे क़ुर्ब से शायद ये फ़ासला बदले

कोई तो ख़ौफ़ मुक़द्दर से बे-अमल हो जाए
कोई अमल ही से क़िस्मत का फ़ैसला बदले

अना के ज़हर को थूको तो मुत्तहिद हो जाएँ
बदी से हारते रहने का सिलसिला बदले

तमाम लम्हों के मौसम उसी के हाथ में हैं
ख़ुदा यूँही रखे किस किस को कौन सा बदले

फ़रेब-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र है कि ये है अज़्मत-ए-हर्फ़
कि मत्न यूँही रहे सिर्फ़ हाशिया बदले

Dilnawaz Siddiqi
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