कभी कभी ही वो मुझ से नहीं झगड़ता है

वगर्ना देखता है और टूट पड़ता है

मिरी नज़र से तो है दूर वो बहुत लेकिन
मिरे ख़याल के हाँ आस-पास पड़ता है

हरा-भरा तो बहुत था वो बाँस का जंगल
किसे पता था मगर आग भी पकड़ता है

यक़ीन उस की रिफ़ाक़त का कर रहा हूँ मैं
कि जिस का काम मेरे दुश्मनों से पड़ता है

यहीं पे रब्त में आता है एक दोराहा
यहीं पे आ के मिरा राब्ता बिगड़ता है

मैं ऐसी जंग में हूँ एक ऐसी जंग जहाँ
मिरा ख़ुलूस ही मेरे ख़िलाफ़ लड़ता है

— Dinesh Kumar Drouna

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