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SHER
ये सोचके तो दूसरी कोई मिट्टी को छु'आ नहीं के बा'द मरने के हिन्दुस्तां में दफनाया जाऊँगा — karan singh rajput
SHER
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा — Allama Iqbal
SHER
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है — Rahat Indori
SHER
तिरंगा शान है मेरी तिरंगा जान है मेरी
तिरंगा सब सेे ऊँचा हो यही पहचान है मेरी
Aves Sayyad
तिरंगा शान है मेरी तिरंगा जान है मेरी तिरंगा सब सेे ऊँचा हो यही पहचान है मेरी — Aves Sayyad
SHER
कभी बिस्मिल से पूछो तुम कभी अशफ़ाक़ से पूछो
वतन क्या चीज़ है यारों भगत आज़ादस पूछो
Prashant Sitapuri
कभी बिस्मिल से पूछो तुम कभी अशफ़ाक़ से पूछो वतन क्या चीज़ है यारों भगत आज़ादस पूछो — Prashant Sitapuri
NAZM
ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
— Faiz Ahmad Faiz
ये दाग़ दाग़ उजाला, ये शबगज़ीदा सहर वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले कर चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज् का साहिल कहीं तो जा के रुकेगा सफ़िना-ए-ग़म-ए-दिल जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन सुना है हो भी चुका है फ़िरक़-ए-ज़ुल्मत-ए-नूर सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ए-हराम जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई अभी चिराग़-ए-सर-ए-रह को कुछ ख़बर ही नहीं अभी गरानि-ए-शब में कमी नहीं आई नजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई — Faiz Ahmad Faiz
NAZM
शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं
— Anand Narayan Mulla
शहीद-ए-जौर-ए-गुलचीं हैं असीर-ए-ख़स्ता-तन हम हैं हमारा जुर्म इतना है हवा-ख़्वाह-ए-चमन हम हैं सताने को सता ले आज ज़ालिम जितना जी चाहे मगर इतना कहे देते हैं फ़र्दा-ए-वतन हम हैं हमारे ही लहू की बू सबा ले जाएगी कनआँ मिलेगा जिस से यूसुफ़ का पता वो पैरहन हम हैं हमें ये फ़ख़्र हासिल है पयाम-ए-नूर लाए हैं ज़मीं पहले-पहल चूमी है जिस ने वो किरन हम हैं सुला लेगी हमें ख़ाक-ए-वतन आग़ोश में अपनी न फ़िक्र-ए-गोर है हम को न मुहताज-ए-कफ़न हम हैं बना लेंगे तिरे ज़िंदाँ को भी हम ग़ैरत-ए-महफ़िल लिए अपनी निगाहों में जमाल-ए-अंजुमन हम हैं नहीं तेशा तो सर टकरा के जू-ए-शीर लाएँगे बयाबान-ए-जुनूँ में जानशीन-ए-कोहकन हम हैं ज़माना कर रहा है कोशिशें हम को मिटाने की हिला पाता नहीं जिस को वो बुनियाद-ए-कुहन हम हैं न दौलत है न सर्वत है न ओहदा है न ताक़त है मगर कुछ बात है हम में कि जान-ए-अंजुमन हम हैं तिरे ख़ंजर से अपने दिल की ताक़त आज़माना है मोहब्बत एक अपनी है तिरा सारा ज़माना है फ़िदा-ए-मुल्क होना हासिल-ए-क़िस्मत समझते हैं वतन पर जान देने ही को हम जन्नत समझते हैं कुछ ऐसे आ गए हैं तंग हम कुंज-ए-असीरी से कि अब इस से तो बेहतर गोशा-ए-तुर्बत समझते हैं हमारे शौक़ की वारफ़्तगी है दीद के क़ाबिल पहुँचती है अगर ईज़ा उसे राहत समझते हैं निगाह-ए-क़हर की मुश्ताक़ हैं दिल की तमन्नाएँ ख़त-ए-चीन-ए-जबीं ही को ख़त-ए-क़िस्मत समझते हैं वतन का ज़र्रा ज़र्रा हम को अपनी जाँ से प्यारा है न हम मज़हब समझते हैं न हम मिल्लत समझते हैं हयात-ए-आरज़ी सदक़े हयात-ए-जावेदानी पर फ़ना होना ही अब इक ज़ीस्त की सूरत समझते हैं हमें मालूम है अच्छी तरह ताब-ए-जफ़ा तेरी मगर इस से सिवा अपनी हद-ए-उल्फ़त समझते हैं ग़म-ओ-ग़ुस्सा दिखाना इक दलील-ए-ना-तवानी है जो हँस कर चोट खाती है उसे ताक़त समझते हैं ग़ुलामी और आज़ादी बस इतना जानते हैं हम न हम दोज़ख़ समझते हैं न हम जन्नत समझते हैं दिखाना है कि लड़ते हैं जहाँ में बा-वफ़ा क्यूँँकर निकलती है ज़बाँ से ज़ख़्म खा कर मर्हबा क्यूँँकर — Anand Narayan Mulla
NAZM
गुलशन में रुत नई है
— Kanval Dibaivi
गुलशन में रुत नई है हर सम्त बे-ख़ुदी है हर गुल पे ताज़गी है मसरूर ज़िंदगी है सरचश्मा-ए-ख़ुशी है छब्बीस जनवरी है हर सू ख़ुशी है छाई सब ने मुराद पाई फिर जनवरी ये आई यौम-ए-सुरूर लाई साअ'त मुराद की है छब्बीस जनवरी है आँखों में रंग-ए-नौ है बातिल से जंग-ए-नौ है साज़ और चंग-ए-नौ है हर दर पे संग-ए-नौ है पुर कैफ़ ज़िंदगी है छब्बीस जनवरी है मैं गुनगुना रहा हूँ मस्ती में गा रहा हूँ ख़ुशियाँ मना रहा हूँ आलम पे छा रहा हूँ दिल महव-ए-बे-ख़ुदी है छब्बीस जनवरी है हिन्दोस्तान ख़ुश है हर पासबान ख़ुश है हर नौ-जवान ख़ुश है सारा जहान ख़ुश है एक जोश-ए-सरमदी है छब्बीस जनवरी है — Kanval Dibaivi
SHER
नक़्शा ले कर हाथ में बच्चा है हैरान कैसे दीमक खा गई उस का हिन्दोस्तान — Nida Fazli
SHER
सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़' क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया — Firaq Gorakhpuri
SHER
ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं
हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं
Mehshar Afridi
ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं — Mehshar Afridi
SHER
तिरंगे को हवा से बात करते देखते हैं जब
बदन में झुरझुरी होती है रोंये फूट जाते हैं
Atul K Rai
तिरंगे को हवा से बात करते देखते हैं जब बदन में झुरझुरी होती है रोंये फूट जाते हैं — Atul K Rai
SHER
वतन की आबरू ख़ातिर लड़ेंगे धड़ जवानों के
हमारे देश की मिट्टी कभी बुज़दिल नहीं होगी
Prashant Sitapuri
वतन की आबरू ख़ातिर लड़ेंगे धड़ जवानों के हमारे देश की मिट्टी कभी बुज़दिल नहीं होगी — Prashant Sitapuri
NAZM
जग से भला संसार से प्यारा
— Ahmaq Phapoondvi
जग से भला संसार से प्यारा दिल की ठंडक आँख का तारा सब से अनोखा सब से न्यारा दुनिया के जीने का सहारा प्यारा भारत देस हमारा कितनी पुर-कैफ़ इस की अदाएँ कितनी दिलकश इस की फ़ज़ाएँ मुश्क से बढ़ कर इस की हवाएँ ख़ुल्द से बेहतर इस का नज़ारा प्यारा भारत देस हमारा मुल्क को हासिल हो आज़ादी ख़त्म हो दौर-ए-सितम-ईजादी दूर हो इस की सब बर्बादी चर्ख़ पे चमके बन के तारा प्यारा भारत देस हमारा हम में पैदा हो यक-जाई सब हों बाहम भाई भाई हिन्दू मुस्लिम, सिख, ईसाई गाएँ मिल कर गीत ये प्यारा प्यारा भारत देस हमारा — Ahmaq Phapoondvi
NAZM
बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज
— Moin Ahsan Jazbi
बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए पहाड़ों के चश्मों को सोना बनाया नए बिल नए ज़ोर इन को सिखाए लिबास-ए-ज़री आबशारों ने पाया नशेबी ज़मीनों पे छींटे उड़ाए घने ऊँचे ऊँचे दरख़्तों का मंज़र ये हैं आज सब आब-ए-ज़र में नहाए मगर इन दरख़्तों के साए में ऐ दिल हज़ारों बरस के ये ठिठुरे से पौदे हज़ारों बरस के ये सिमटे से पौदे ये हैं आज भी सर्द बेहाल बे-दम ये हैं आज भी अपने सर को झुकाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है जो ऐसे दरख़्तों में भी राह पाए जो ठहरे हुओं को जो सिमटे हुओं को हरारत भी बख़्शे गले भी लगाए बड़े नाज़ से आज उभरा है सूरज हिमाला के ऊँचे कलस जगमगाए फ़ज़ाओं में होने लगी बारिश-ए-ज़र कोई नाज़नीं जैसे अफ़्शाँ छुड़ाए दमकने लगे यूँँ ख़लाओं के ज़र्रे कि तारों की दुनिया को भी रश्क आए हमारे उक़ाबों ने अंगड़ाइयाँ लीं सुनहरी हवाओं में पर फड़फड़ाए फ़ुज़ूँ-तर हुआ नश्शा-ए-कामरानी तजस्सुस की आँखों में डोरे से आए क़दम चूमने बर्क़-ओ-बाद आब-ओ-आतिश ब-सद-शौक़ दौड़े ब-सद-इज्ज़ आए मगर बर्क़ ओ आतिश के साए में ऐ दिल ये सदियों के ख़ुद-रफ़्ता नाशाद ताइर ये सदियों के पर-बस्ता बर्बाद ताइर ये हैं आज भी मुज़्महिल दिल-गिरफ़्ता ये हैं आज भी अपने सर को छुपाए अरे ओ नई शान के मेरे सूरज तिरी आब में और भी ताब आए तिरे पास ऐसी भी कोई किरन है उन्हें पंजा-ए-तेज़ से जो बचाए इन्हें जो नए बाल-ओ-पर आ के बख़्शे इन्हें जो नए सिर से उड़ना सिखाए — Moin Ahsan Jazbi
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